Alaska News: भारत के चुनावों में मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए हमनाम यानी ‘डमी उम्मीदवार’ उतारने की रणनीति अब अमेरिकी राजनीति में भी चर्चा का केंद्र बन गई है। अलास्का की सीनेट सीट पर रिपब्लिकन सीनेटर डैन एस. सुलिवन के सामने रिटायर्ड शिक्षक डैनियल जे. सुलिवन के मैदान में उतरने से सियासी घमासान छिड़ गया है। रिपब्लिकन पार्टी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे डेमोक्रेट्स की सोची-समझी साजिश करार दिया है, जबकि मामले में अमेरिकी न्याय विभाग और एफबीआई जांच कर रही है।
भारत में पंचायत से लेकर लोकसभा चुनाव तक विरोधी उम्मीदवार के वोट काटने के लिए मिलते-जुलते नाम वाले प्रत्याशी उतारने के कई उदाहरण देखे गए हैं। वर्ष 2019 में केरल की वायनाड सीट पर राहुल गांधी के सामने उनके हमनाम प्रत्याशी मैदान में थे, वहीं 2014 में छत्तीसगढ़ के महासमुंद में चंदूलाल साहू के नाम से मिलते-जुलते कई प्रत्याशियों को उतारा गया था। अब इसी तरह का राजनीतिक विवाद अमेरिका के अलास्का राज्य में सीनेट चुनाव के दौरान देखने को मिल रहा है।
अलास्का सीनेट सीट पर त्रिकोणीय मोड़
अलास्का में रिपब्लिकन पार्टी के मौजूदा सीनेटर डैन एस. सुलिवन लगातार तीसरी बार छह वर्ष के कार्यकाल के लिए चुनाव मैदान में हैं। उनके समक्ष डेमोक्रेटिक पार्टी की मुख्य उम्मीदवार मैरी पेल्टोला चुनौती पेश कर रही हैं। हालांकि, मुकाबले में रिटायर्ड स्कूल शिक्षक डैनियल जे. सुलिवन जूनियर के पर्चा भरने से स्थिति पेचीदा हो गई है। रिपब्लिकन खेमे का आरोप है कि मतदाताओं में भ्रम पैदा करने और आधिकारिक उम्मीदवार के वोट बांटने के मकसद से यह डमी कैंडिडेट उतारा गया है।
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, डेमोक्रेटिक अभियान से जुड़े लोगों द्वारा ऐसे विकल्प तलाशने के दावे सामने आए थे, हालांकि मैरी पेल्टोला और डेमोक्रेटिक पार्टी ने इन आरोपों का खंडन किया है। विवाद गहराने पर अलास्का के गवर्नर माइक डनलीवी के निर्देश और न्याय विभाग की पहल पर एफबीआई ने डैनियल सुलिवन को मिले चुनावी चंदे की जांच शुरू की है।
अदालती फैसला और रैंक्ड चॉइस वोटिंग का प्रभाव
अमेरिकी कानूनी व्यवस्था के तहत किसी उम्मीदवार का नाम समान होना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। यही कारण है कि अलास्का की अदालत ने डैनियल जे. सुलिवन की उम्मीदवारी को वैध ठहराते हुए चुनाव लड़ने की अनुमति दी है।
इस चुनाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी अलास्का में लागू ‘रैंक्ड चॉइस वोटिंग’ प्रणाली है। इस व्यवस्था में मतदाता प्रत्याशियों को प्राथमिकता क्रम (पहली, दूसरी और तीसरी पसंद) के आधार पर वोट देते हैं। यदि किसी प्रत्याशी को 50 प्रतिशत से अधिक प्रथम वरीयता के मत नहीं मिलते, तो सबसे कम वोट पाने वाला बाहर हो जाता है और उसके वोट मतदाताओं की अगली पसंद को स्थानांतरित हो जाते हैं।
चुनाव विशेषज्ञों के मुताबिक, इस प्रणाली के चलते हमनाम उम्मीदवार के कारण वोट बंटने का खतरा परंपरागत मतदान के मुकाबले कम रहता है, बशर्ते मतदाता अपनी अगली प्राथमिकताओं को स्पष्ट रूप से दर्ज करें।