Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि उच्च न्यायालयों को एफआईआर रद्द करने की अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्राथमिकी रद्द करने की याचिकाओं पर विचार करते समय हाईकोर्ट को मुकदमे का मिनी-ट्रायल करने का अधिकार नहीं है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील पर यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में कर्नाटक पुलिस के अधिकारियों पर दर्ज 6 प्राथमिकियों को रद्द कर दिया था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के इस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
पहली नजर में अपराध की जांच ही पर्याप्त
जस्टिस करोल ने फैसला सुनाते हुए कहा कि एफआईआर रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते समय अदालत को जांच से जुड़ी सामग्री की गैर-जरूरी छानबीन से बचना चाहिए। हाईकोर्ट को केवल यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया दिए गए तथ्यों से कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं। शुरुआती चरण में ही विस्तृत जांच करना गलत है।
अदालत ने टिप्पणी की कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपने तय दायरे से बाहर जाकर काम किया। हाईकोर्ट ने देरी और पैसे की वसूली का सीधा सबूत न होने के आधार पर मामले रद्द किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये बातें मुकदमे के बाद बरी होने का आधार तो हो सकती हैं, लेकिन एफआईआर रद्द करने का नहीं।
वर्ष 2020 का है पूरा मामला
कर्नाटक पुलिस ने साल 2020 में बेंगलुरु की सेंट्रल क्राइम ब्रांच के सहायक पुलिस आयुक्त प्रभु शंकर और अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत 6 मामले दर्ज किए थे। आरोपी अधिकारियों ने इन एफआईआर को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसे हाईकोर्ट ने सितंबर 2021 में मंजूर कर लिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि एफआईआर रद्द करने का अधिकार बहुत असाधारण परिस्थितियों में ही इस्तेमाल होना चाहिए। इस फैसले से आपराधिक मामलों की शुरुआती जांच प्रक्रिया में अदालती दखल को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो गई है।