Delhi News: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के लिए आरक्षण ऐतिहासिक और सामाजिक पिछड़ेपन पर आधारित है। सरकार ने आरक्षित श्रेणियों के भीतर आय-आधारित उप-कोटा लागू करने की मांग वाली याचिका का कड़ा विरोध किया है।
आरक्षण नीति बनाना कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने शीर्ष अदालत में हलफनामा दायर किया है। सरकार ने कहा कि याचिका में आरक्षण पर नीति बनाने के लिए अदालती निर्देश मांगे गए हैं। यह विषय पूरी तरह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसे रिट ऑफ मैंडमस के जरिए लागू नहीं किया जा सकता।
सरकार ने हलफनामे में बताया कि अनुसूचित जातियों को छुआछूत के कारण ऐतिहासिक नुकसान झेलना पड़ा है। वहीं अनुसूचित जनजातियों की अपनी विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव और पिछड़ापन है। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान उनके सामाजिक, शैक्षणिक नुकसान और सेवाओं में कम प्रतिनिधित्व से होती है।
संसद को ही संवैधानिक सूचियों में संशोधन का हक
केंद्र सरकार ने याचिका का जवाब देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद-341, अनुच्छेद-342 और अनुच्छेद-342ए के तहत यह व्यवस्था बनी है। केवल आर्थिक आधार पर इन सूचियों में बदलाव नहीं हो सकता। राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित इन सूचियों में संशोधन करने का अधिकार केवल संसद के पास ही सुरक्षित है।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल इस याचिका में एससी, एसटी, ओबीसी और ईडब्ल्यूएस श्रेणियों के अंदर आय-आधारित प्राथमिकताएं देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि आरक्षित वर्गों के भीतर उप-वर्गीकरण बनाकर नीति बने, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को पहले लाभ मिल सके।
एससी और एसटी वर्गों पर क्रीमी लेयर नियम लागू नहीं
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में साफ किया कि एससी और एसटी वर्गों पर क्रीमी लेयर का नियम लागू नहीं होता है। सरकार ने इंदिरा साहनी, ईवी चिन्नैया, एम नागराज और अशोक कुमार ठाकुर मामलों के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया। सरकार के अनुसार क्रीमी लेयर का सिद्धांत केवल ओबीसी आरक्षण के लिए बना है।