New Delhi News: उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को एक अहम फैसले में कहा कि भारतीय वायुसेना के कर्मियों को असैन्य पदों पर नियुक्ति के लिए अपनी मर्जी से नौकरी छोड़ने का असीमित अधिकार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा छोड़ने से पहले अनुमति लेना केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं है।
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि अभियानगत तैयारी बनाए रखने के लिए निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन अनिवार्य है। अनुशासित बल का हिस्सा होने के नाते वायु योद्धाओं को निर्धारित नियमों का पालन करना ही होगा।
असैन्य पद के आवेदन के लिए एनओसी लेना अनिवार्य
फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि असैन्य पद के लिए आवेदन करने से पहले अनुमति लेना और चयन के बाद अनापत्ति प्रमाण पत्र यानी एनओसी हासिल करना जरूरी है। कोई भी एयरमैन अपनी मर्जी से इन नियमों को नजरअंदाज नहीं कर सकता है।
शीर्ष अदालत ने कॉरपोरल नखत सिंह की याचिका खारिज कर दी। नखत सिंह राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा सहायक प्रोफेसर के पद पर चुने गए थे। उन्होंने वायुसेना से एनओसी जारी करने और सेवा से मुक्त करने का अनुरोध किया था, जिसे कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया।
नखत सिंह ने सात साल की सेवा पूरी करने के बाद नवंबर 2020 में जारी भर्ती विज्ञापन के तहत आवेदन किया था। वह परीक्षा और इंटरव्यू में सफल रहे, लेकिन एयर ऑफिसर कमांडिंग ने अक्टूबर 2022 में उनकी एनओसी अर्जी खारिज कर दी थी।
सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और हाईकोर्ट के फैसले को रखा बरकरार
वायुसेना के 2017 के आदेश के अनुसार असैन्य पद के लिए आवेदन करने से पहले सक्षम अधिकारी से अनुमति लेना अनिवार्य है। एयर ऑफिसर कमांडिंग के फैसले के खिलाफ नखत सिंह की अर्जी सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और दिल्ली हाईकोर्ट से खारिज हो चुकी थी।
इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि अनुशासित बल में प्रक्रियात्मक नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती। इस फैसले से वायुसेना में कार्यरत अन्य कर्मियों के असैन्य सेवाओं में जाने की प्रक्रिया पर बड़ा असर पड़ेगा।