Pennsylvania News: अमेरिका की पेन स्टेट यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में हुए एक नए अध्ययन से खुलासा हुआ है कि जलवायु संकट के कारण होने वाला पलायन केवल तात्कालिक आजीविका की मजबूरी नहीं है। बेहतर शिक्षा, उच्च आमदनी और भविष्य की तरक्की की आकांक्षाएं भी लोगों के फैसले और गंतव्य को तय करने में 50 प्रतिशत तक अधिक असर डालती हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण आजीविका पर मंडराते संकट के बीच होने वाला पलायन केवल पेट भरने की मजबूरी का परिणाम नहीं है। एक अंतरराष्ट्रीय शोध के अनुसार, बेहतर शिक्षा, हुनर और भविष्य में तरक्की की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं भी विस्थापन की दिशा और गति तय करने में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। अमेरिका की पेन स्टेट यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘ग्लोबल एनवायरमेंटल चेंज’ में प्रकाशित किए गए हैं।
शोधकर्ताओं ने अध्ययन के लिए पश्चिम अफ्रीकी देश सेनेगल को आधार बनाया, जहां की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण आबादी बड़े पैमाने पर कृषि पर निर्भर है। इस अध्ययन में कंप्यूटर मॉडल के माध्यम से 25 वर्षों के दौरान सूखे, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और सामान्य मौसमी परिस्थितियों के आधार पर मानवीय फैसलों का गहन विश्लेषण किया गया।
भविष्य की आकांक्षाओं से पलायन में 50 प्रतिशत तक का इजाफा
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने दो अलग-अलग कंप्यूटर मॉडलों की तुलना की। पहले मॉडल में लोगों के फैसलों को केवल तात्कालिक रोजगार और दैनिक आजीविका के दायरे में परखा गया। वहीं दूसरे मॉडल में भविष्य की योजनाओं, उच्च शिक्षा और दीर्घकालिक आय की संभावनाओं को भी जोड़ा गया।
विश्लेषण में सामने आया कि जब मॉडल में लोगों के सपनों और करियर की आकांक्षाओं को शामिल किया गया, तो जलवायु संकट के दौर में पलायन करने वाले लोगों की औसत संख्या पारंपरिक मॉडलों की तुलना में करीब 50 प्रतिशत अधिक दर्ज की गई। इसके अलावा, लोगों ने उन गैर-पारंपरिक क्षेत्रों का रुख भी किया, जिन्हें सामान्य पलायन मॉडल में प्रमुख गंतव्य नहीं माना जाता था। इससे साबित होता है कि प्रभावित आबादी केवल निकटतम काम नहीं खोजती, बल्कि भविष्य के अवसरों का मूल्यांकन भी करती है।
सूखे और तटीय संकट के बीच बदलती प्राथमिकताएं
अध्ययन में यह भी रेखांकित किया गया कि जलवायु संकट पलायन के स्थापित रास्तों को बदल रहा है। सेनेगल की राजधानी डकार जैसे तटीय शहरों में समुद्र का बढ़ता जलस्तर नई चुनौतियां खड़ी कर रहा है। वहीं, ग्रामीण इलाकों में लंबे सूखे के कारण परिवारों की बचत खत्म हो जाती है, जिससे लंबी दूरी तय करना या महंगे शहरों में बसना कठिन हो जाता है।
ऐसी स्थिति में देश के आंतरिक और सुरक्षित क्षेत्रों में जाकर व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करना लोगों के लिए अधिक व्यावहारिक विकल्प बन जाता है। इस प्रकार जलवायु संकट यह भी निर्धारित करता है कि लोग अपनी आर्थिक सीमाओं के भीतर किस दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं।
ग्रामीण प्रशिक्षण केंद्रों से मिल सकती है राहत
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि ग्रामीण क्षेत्रों में व्यावसायिक प्रशिक्षण और कौशल विकास के अवसर बढ़ाकर जलवायु संकट के दबाव को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। स्थानीय स्तर पर हुनर और आजीविका मिलने से युवाओं को बेहतर अवसरों के लिए दूरदराज के क्षेत्रों में विस्थापन के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।
अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि जलवायु नीति-निर्माताओं को विस्थापन के आकलन में केवल मौसम, आय और जनसंख्या के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। नीतियों को धरातल पर प्रभावी बनाने के लिए लोगों की आर्थिक सीमाओं के साथ-साथ उनके भविष्य के सपनों और आकांक्षाओं को भी सरकारी योजनाओं में शामिल करना आवश्यक है।