New Delhi News: वैश्विक स्तर पर सक्रिय सुपर अल-नीनो को लेकर जारी क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के ट्रैकर ने गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक अक्टूबर से मार्च के बीच भारत में अत्यधिक गर्मी और मौसमी बदलाव से करीब 55,000 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। हालांकि यह सरकारी अलर्ट नहीं बल्कि जलवायु मॉडल पर आधारित अनुमान है, जिसका वास्तविक असर बचाव की तैयारियों पर निर्भर करेगा।
वैश्विक जलवायु में आ रहे बड़े बदलावों के बीच ‘सुपर अल-नीनो’ के संभावित खतरों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के ‘अल-नीनो हीट मॉर्टेलिटी ट्रैकर’ के अनुसार, अक्टूबर से मार्च के छह महीनों के दौरान भारत में गर्मी से संबंधित कारणों से लगभग 55,000 अतिरिक्त मौतों की आशंका जताई गई है। अनुमान के मुताबिक इनमें से अधिकांश मौतें मार्च के महीने में दर्ज हो सकती हैं। हालांकि यह किसी सरकारी एजेंसी का आधिकारिक अलर्ट नहीं है, बल्कि जलवायु और स्वास्थ्य के सांख्यिकीय मॉडल पर आधारित एक अनुमान है।
वैश्विक स्तर पर 3.73 लाख से अधिक मौतों का अनुमान
ट्रैकर के आंकड़ों के अनुसार, अगले छह महीनों में पूरी दुनिया में अत्यधिक गर्मी के कारण 3.73 लाख से अधिक अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। इस सूची में भारत शीर्ष प्रभावित देशों में शामिल है। भारत के अलावा नाइजीरिया में करीब 56,000, इंडोनेशिया में लगभग 29,000 और ब्राजील में 19,000 अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया है। दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के कई अन्य देशों में भी मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों का खतरा मंडरा रहा है।
1950 के बाद सबसे ताकतवर अल-नीनो की श्रेणी में
विश्व मौसम संगठन (WMO) के मुताबिक, वर्तमान अल-नीनो की स्थिति 1950 के बाद के सबसे मजबूत दौर में से एक मानी जा रही है। सितंबर महीने तक भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3.08 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया है। समुद्री तापमान में इस अप्रत्याशित वृद्धि के कारण ही मौसम विशेषज्ञ इसे ‘सुपर अल-नीनो’ कह रहे हैं।
अल-नीनो की सक्रियता से समुद्र के तापमान के साथ-साथ हवाओं की दिशा और बारिश का पूरा चक्र प्रभावित होता है। इसके प्रभाव से दुनिया के कुछ हिस्सों में भीषण सूखा पड़ता है, जबकि अन्य इलाकों में अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और असामान्य लू की स्थिति बन जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह आंकड़ा पूरी तरह से एक जलवायु अनुमान पर आधारित है और इसे निश्चित मौतों की संख्या नहीं माना जाना चाहिए। मौतों का वास्तविक दायरा स्थानीय मौसम की वास्तविक स्थितियों, सरकारों के पूर्व प्रबंधन और गर्मी से बचाव के लिए किए जाने वाले बुनियादी इंतजामों पर काफी हद तक निर्भर करेगा।