Delhi News: प्रसिद्ध नारीवादी विद्वान सिमोन द बोउवार ने कहा था कि कोई औरत पैदा नहीं होती बल्कि बनती है। जेंडर केवल जैविक नहीं बल्कि सामाजिक बनावट है। भारतीय संदर्भ में स्त्री रूप धरने और जेंडर अभिव्यक्ति की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसका प्रभाव पौराणिक कथाओं से लेकर लोक कलाओं में स्पष्ट दिखता है।
महाभारत काल और शास्त्रीय नृत्यों में वेशभूषा का इतिहास
भारतीय इतिहास में जब महिलाओं को सार्वजनिक मंचों पर आने की अनुमति नहीं थी, तब पुरुष ही स्त्री पात्र निभाते थे। नाट्यशास्त्र, कथकली, जात्रा और यक्षगान में पुरुषों द्वारा स्त्री रूप धरना सामान्य रहा। महाभारत में अर्जुन का ‘बृहन्नला’ रूप और शिखंडी का आख्यान जेंडर बदलाव की गहरी पौराणिक कथाएं प्रस्तुत करते हैं।
लोक परंपराओं और धार्मिक अनुष्ठानों में स्त्री रूप का उत्सव
अहमदाबाद में नवरात्रि पर बारोट समुदाय के पुरुष साड़ी पहनकर गरबा करते हैं। वहीं केरल के कोट्टनकुलंगारा मंदिर में ‘चमायाविलक्कू’ उत्सव पर हजारों पुरुष स्त्री वेश में देवी पूजा करते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर भारत का पारंपरिक ‘लौंडा नाच’ भी पुरुषों द्वारा स्त्री वेश में नृत्य की प्राचीन कला शैली मानी जाती है।
आधुनिक मंचों पर पहचान और नए मुकाम की तलाश
आज का आधुनिक भारतीय ‘ड्रैग’ केवल मनोरंजन या कॉमेडी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के स्त्री-तत्व का उत्सव है। किटी-सू और गे-साई फैमिली जैसे मंच भारतीय कलाकारों को स्पेस दे रहे हैं। युवा ड्रैग कलाकार इसे एक गंभीर और स्वतंत्र आर्ट फॉर्म के रूप में स्थापित करने के लिए संघर्षरत हैं।