Hamirpur News: हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर के छात्र सर्वेश शर्मा के 87 हजार रुपये में ड्रोन प्रोटोटाइप तैयार करने और 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मिलने के दावे पर डिफेंस इनोवेशन ऑर्गेनाइजेशन (iDEX-DIO) ने स्पष्टीकरण जारी किया है। संस्था ने ग्रांट मिलने की खबर को फर्जी करार दिया है, जिसके बाद इस चर्चित तकनीकी उपलब्धि और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
हमीरपुर जिले के राजकीय बहुतकनीकी संस्थान बड़ू में कंप्यूटर इंजीनियरिंग के पांचवें सेमेस्टर के छात्र सर्वेश शर्मा द्वारा कम लागत में ड्रोन का प्रोटोटाइप तैयार करने की कहानी पिछले कुछ समय से सुर्खियों में थी। दावा किया गया था कि साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले सर्वेश ने महज 87 हजार रुपये की लागत से ‘रुद्र एज टी-1 (स्पेक्ट्रा)’ नाम से ड्रोन का प्रोटोटाइप विकसित किया है, जिसे सीमा निगरानी और जैमिंग जैसी आधुनिक तकनीकों के लिए तैयार किया जाना था।
इस कहानी को तब और बड़ा आयाम मिला जब रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाली संस्थाओं iDEX और DIO के माध्यम से इस प्रोजेक्ट के लिए 3.50 करोड़ रुपये की भारी-भरकम ग्रांट मंजूर हुई है। साथ ही इसे आईआईटी रुड़की में आगे विकसित करने की बात भी कही गई थी। हालांकि, अब संस्था के आधिकारिक रुख ने इन दावों की हवा निकाल दी है।
iDEX-DIO का स्पष्टीकरण और खुलासे
इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX) और डिफेंस इनोवेशन ऑर्गेनाइजेशन (DIO) ने 28 अक्तूबर को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि सर्वेश शर्मा के प्रोजेक्ट के लिए 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर होने का दावा पूरी तरह से निराधार और फर्जी है। संस्था के अनुसार, यह खबर पिछले करीब दो महीनों से विभिन्न माध्यमों पर प्रसारित हो रही थी, लेकिन इसमें कोई आधिकारिक सच्चाई नहीं है।
इस खुलासे के बाद पत्रकारिता और सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली सूचनाओं की विश्वसनीयता को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारों का मानना है कि किसी असाधारण उपलब्धि से जुड़ी खबरों को प्रकाशित करने से पहले उनकी जमीनी और आधिकारिक पुष्टि होना बेहद जरूरी है।
प्रतियोगिता में पुरस्कार और प्रोटोटाइप की वास्तविकता
इससे पहले सामने आई जानकारियों के मुताबिक, सर्वेश की टीम ने आईआईटी जोधपुर और कोणार्क कोर से जुड़ी राष्ट्रीय स्तर की ओपन कार्डबोर्ड ड्रोन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। इस प्रतियोगिता में देश भर के करीब 50 संस्थानों ने भाग लिया था, जहां सर्वेश की टीम को चौथा स्थान मिलने के साथ 10 लाख रुपये का पुरस्कार मिलने की बात सामने आई थी।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी प्रतियोगिता में पुरस्कार जीतना, कम लागत में प्रोटोटाइप तैयार करना और किसी रक्षा परियोजना के लिए करोड़ों रुपये की सरकारी ग्रांट स्वीकृत होना तीन बिल्कुल अलग बातें हैं। शुरुआती रिपोर्टों में इन तीनों को जोड़कर एक बड़ी सफलता के रूप में पेश कर दिया गया था, जबकि प्रोटोटाइप बनाने और ग्रांट मिलने के दावों के बीच का अंतर स्पष्ट नहीं किया गया था।
छात्र के हॉस्टल से गिरने की घटना और अन्य पहलू
इसी पूरे घटनाक्रम के बीच सर्वेश शर्मा के हॉस्टल से गिरकर घायल होने का मामला भी सामने आया। 28 अक्तूबर को हुई इस दुर्घटना के बाद उन्हें तुरंत हमीरपुर मेडिकल कॉलेज ले जाया गया, जहां से उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए पीजीआई चंडीगढ़ रेफर कर दिया गया। पुलिस इस मामले की अपने स्तर पर जांच कर रही है।
प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का स्पष्ट करना है कि छात्र के साथ हुए इस दुर्भाग्यपूर्ण हादसे और ड्रोन प्रोजेक्ट की फंडिंग को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब तक किसी भी तरह के संबंध की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में दोनों घटनाओं को आपस में जोड़कर किसी प्रकार की साजिश या दबाव की थ्योरी गढ़ना पूरी तरह से तथ्यों से परे है।
अब किन सवालों के जवाब जरूरी?
इस पूरे प्रकरण के बाद कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके आधिकारिक और तथ्यात्मक जवाब सामने आने बाकी हैं:
- 3.50 करोड़ रुपये की ग्रांट मंजूर होने का दावा सबसे पहले किस आधार और स्रोत से सामने आया था?
- क्या इस प्रोजेक्ट को लेकर किसी स्तर पर कोई औपचारिक आवेदन, पत्राचार या प्रारंभिक चर्चा हुई थी, जिसे बढ़ा-चढ़ाकर मंजूरी मान लिया गया?
- 87 हजार रुपये की लागत से तैयार किए गए इस प्रोटोटाइप की तकनीकी क्षमताओं का स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा किस स्तर पर सत्यापन हुआ था?
- पूर्व में प्रकाशित रिपोर्ट्स में आईआईटी रुड़की से जुड़ी जो समयसीमा और योजनाएं बताई गई थीं, उनकी वास्तविक स्थिति क्या है?
फिलहाल, इस पूरे घटनाक्रम से यह बड़ा सबक मिलता है कि युवा प्रतिभाओं की हौसलाफजाई जरूरी है, लेकिन सनसनीखेज दावों और बिना पुष्टि के करोड़ों की फंडिंग जैसी खबरों को प्रचारित करने से पहले उनकी सत्यता की जांच करना अनिवार्य है।