Mandi News: हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ों पर ग्लेशियल झीलों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। इससे राज्य की घाटियों में जल प्रलय का खतरा गहरा गया है। आईआईटी मंडी के एक स्टडी में लगभग 2,000 झीलों की मैपिंग की गई है। इसमें 9 झीलों को हाई रिस्क और 5 को बेहद संवेदनशील माना गया है।
आईआईटी मंडी के अध्ययन में पाया गया कि साल 2015 से 2025 के बीच कई झीलों का एरिया 30 परसेंट तक बढ़ गया है। रिपोर्ट के अनुसार गेपांग गथ, वासुकी, कशांग, कालीकुंड, होली डैम का ऊपरी हिस्सा और दारचा के योचे क्षेत्र की झीलें गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं।
ये प्राकृतिक झीलें ग्लेशियर के मलबे से बने कमजोर बांधों के सहारे टिकी हैं। अगर ये प्राकृतिक बांध टूटते हैं, तो अचानक आने वाला पानी निचले इलाकों में तबाही मचा सकता है। इसे तकनीकी भाषा में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी जीएलओएफ (GLOF) कहा जाता है।
लाहुल-स्पीति की समुद्र टापू झील में करीब 6.979 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी जमा है। वहीं गेपांग गथ झील में लगभग 3.986 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी मौजूद है। इन झीलों में संभावित विस्फोट से सिस्सु, छतडू, कशांग हाइड्रो प्रोजेक्ट, पवारी, रिकांगपिओ और नेशनल हाईवे-5 सीधे खतरे की जद में आ सकते हैं।
इसके अलावा चंबा और दारचा में बने कई अहम पुल, प्रोजेक्ट और नदियों के किनारे बसे गांव भी जोखिम में हैं। वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि संवेदनशील झीलों पर तुरंत अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए जाएं। साथ ही सुरक्षित तरीके से पानी बाहर निकालने के उपाय लागू किए जाएं।