गोबिंदसागर झील की सिल्ट में दबी है लाखों लोगों की आस्था, सात दशक बाद भी स्थायी ठिकाने का इंतजार कर रहे जलमग्न प्राचीन मंदिर

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Bilaspur News: गोबिंदसागर झील की सिल्ट में आज भी लाखों लोगों की गहरी आस्था दबी हुई है। करीब सात दशक पहले भाखड़ा बांध के निर्माण के कारण पुराने बिलासपुर शहर के साथ जलमग्न हुए ऐतिहासिक मंदिर आज भी अपने स्थायी ठिकाने का इंतजार कर रहे हैं। हर साल गर्मियों में झील का जलस्तर घटने पर इन प्राचीन मंदिरों के अवशेष दिखाई देने लगते हैं, लेकिन मानसून आते ही ये दोबारा पानी में समा जाते हैं।

अधर में लटकी है 1450 करोड़ रुपए की स्थानांतरण परियोजना

इन ऐतिहासिक मंदिरों को झील से बाहर निकालकर सुरक्षित स्थान पर स्थापित करने के लिए करीब 1450 करोड़ रुपए की एक बड़ी योजना तैयार की गई थी। एशियाई विकास बैंक (ADB) के माध्यम से इस परियोजना को आगे बढ़ाने के प्रयास किए गए थे। योजना के तहत मिट्टी की जांच भी करवाई गई और इसके सैंपल जांच के लिए भेजे गए थे, जिनके परिणाम भी सकारात्मक आए थे। इस पूरी प्रक्रिया पर करीब छह करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद यह परियोजना अभी तक आगे नहीं बढ़ पाई है।

वर्ष 2019 में ‘इंडियन ट्रस्ट फॉर रूरल हेरिटेज डेवलपमेंट’ के विशेषज्ञों ने बिलासपुर के सांडू क्षेत्र से मंदिरों में इस्तेमाल किए गए पत्थरों के सैंपल एकत्र किए थे। इसके अलावा, मंदिरों को पुनस्थापित करने के लिए बंदला रोड पर काला बाबा कुटिया के पास करीब 28 बीघा जमीन भी चिह्नित की गई थी, लेकिन यह प्रयास भी अभी तक किसी ठोस परिणाम तक नहीं पहुंच पाया है।

जलमग्न होने वाले प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर

गोबिंदसागर झील में जलमग्न होने वाले प्रमुख प्राचीन मंदिरों में रंगनाथ, खुनमुखेश्वर, ठाकुरद्वारा, मुरली मनोहर, गोपाल और हनुमान मंदिर शामिल हैं। इन सभी मंदिरों का ऐतिहासिक महत्व आज भी क्षेत्र के लोगों की आस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है।

वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार कुलदीप चंदेल ने इस विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भाखड़ा बांध के निर्माण के कारण बिलासपुर के लोगों को अपने पुश्तैनी घर और जमीनें छोड़नी पड़ी थीं, और इसी दौरान कई ऐतिहासिक मंदिर भी गोबिंदसागर झील में समा गए। इन मंदिरों के साथ लाखों लोगों की भावनाएं जुड़ी हैं, इसलिए सरकार को इनके संरक्षण और उचित स्थानांतरण के लिए गंभीरता से ठोस कदम उठाने चाहिए।

गर्मियों में दिखते हैं अवशेष, धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना

सतलुज नदी पर जलाशय बनने और बांध के निर्माण के चलते वर्ष 1963-64 के दौरान पुराना बिलासपुर शहर और उसके लगभग 28 ऐतिहासिक मंदिर जलमग्न हो गए थे। गर्मियों में जलस्तर कम होने पर इन मंदिरों के अवशेष साफ नजर आने लगते हैं, जबकि जुलाई में मानसून के आगमन के बाद जलस्तर बढ़ने से ये फिर से झील में विलीन हो जाते हैं।

इस बीच, बिलासपुर सदर के विधायक त्रिलोक जम्वाल ने बताया कि गोबिंदसागर झील में हर साल जलमग्न होने वाले इन ऐतिहासिक मंदिरों के संरक्षण और सुरक्षित स्थानांतरण के लिए विशेष योजना तैयार की गई है। इसके साथ ही क्षेत्र में धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ वाटर स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने की दिशा में भी लगातार प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि बिलासपुर को पर्यटन मानचित्र पर एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभारा जा सके।

Mohit
Mohit
पत्रकारिता के क्षेत्र में 9 सालों का अनुभव।

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