New Delhi: संसद के मॉनसून सत्र के अंतिम सप्ताह में जबरदस्त राजनीतिक हंगामे के आसार बन रहे हैं। विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन (एफसीआरए) विधेयक को लेकर कांग्रेस समेत पूरा विपक्षी खेमा केंद्र सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है। विरोध की अगुवाई करते हुए कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया है।
कांग्रेस ने अपने सभी लोकसभा सदस्यों को 10, 11 और 12 अगस्त को सदन में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का तीन पंक्ति का व्हिप जारी किया है। माना जा रहा है कि विपक्षी गठबंधन इंडिया के अन्य प्रमुख घटक दल भी जल्द ही अपने सांसदों के लिए इसी तरह का अनिवार्य निर्देश जारी कर सकते हैं।
लोकसभा में आगामी 10 अगस्त को एफसीआरए संशोधन बिल पेश किए जाने की संभावना है। चूंकि यह महत्वपूर्ण विधेयक गृह मंत्रालय के अधीन आता है, इसलिए विपक्षी दलों को पूरी उम्मीद है कि इस गंभीर चर्चा के दौरान गृह मंत्री अमित शाह सदन में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहेंगे।
गृह मंत्री की मौजूदगी और पुलिस कार्रवाई पर जवाब की मांग
राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यालय में हुई एक अहम रणनीतिक बैठक में कांग्रेस नेतृत्व ने सहयोगी दलों से सांसदों की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करने को कहा है। विपक्ष मॉनसून सत्र की शुरुआत से ही संसद मार्च के दौरान हुए प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर जवाब मांग रहा है।
कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर का कहना है कि विपक्ष परिसीमन और एफसीआरए बिल पर सरकार का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार देश भर में जारी छात्रों के बड़े विरोध प्रदर्शनों से आम जनता का ध्यान भटकाने के उद्देश्य से यह कदम उठा रही है।
सपा और टीएमसी ने स्पष्ट किया अपना राजनीतिक रुख
विपक्षी गठबंधन के घटक दल समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर कांग्रेस को पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की है। सपा के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि उनकी पार्टी विपक्ष के साझा एजेंडे के साथ मजबूती से खड़ी है और आवश्यकता पड़ने पर आधिकारिक व्हिप भी जारी किया जाएगा।
दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेतृत्व ने भी अपने सभी सांसदों को सप्ताह की शुरुआत से ही सदन में मौजूद रहने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। हालांकि सपा नेताओं को यह अंदेशा भी है कि सरकार गृह मंत्री की जगह गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय को चर्चा के लिए भेज सकती है।
एफसीआरए बिल के प्रावधानों और विवाद का मुख्य कारण
प्रस्तावित एफसीआरए बिल के कई विवादित प्रावधानों को लेकर धार्मिक और सामाजिक संगठनों में भारी चिंता देखी जा रही है। विशेषकर ईसाई संस्थानों को डर है कि पंजीकरण समाप्त होने पर उनकी पुरानी संपत्तियों का अधिकार सरकार द्वारा अधिकृत संस्था के पास जाने से काफी नुकसान पहुंच सकता है।
भारतीय जनता पार्टी के लिए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है, क्योंकि वह केरल जैसे राज्यों में ईसाई समुदाय के बीच अपनी पैठ बढ़ाना चाहती है। पूर्वव्यापी प्रभाव के नियम को हटाने को लेकर मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर ज्ञापन भी सौंपा था।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू स्पष्ट कर चुके हैं कि 13 अगस्त को समाप्त हो रहे मॉनसून सत्र की अवधि बढ़ाने का फिलहाल कोई विचार नहीं है। वहीं राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने सरकार से विपक्षी भावनाओं का सम्मान करते हुए गृह मंत्री की सदन में उपस्थिति सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है।