Chamba News: हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला 26 जुलाई से 2 अगस्त तक मनाया जाएगा। यह ऐतिहासिक उत्सव सावन महीने के दूसरे रविवार से शुरू होता है। इस खास मेले में हिंदू और मुस्लिम एकता की अद्भुत मिसाल देखने को मिलती है, जहां पुरानी परंपराएं आज भी जीवित हैं।
देवभूमि हिमाचल अपनी अनूठी संस्कृति और त्योहारों के लिए जाना जाता है। शिवभूमि चंबा का यह मिंजर मेला पूरे भारत में काफी फेमस है। रावी नदी के किनारे बसे इस शहर को राजा साहिल वर्मन ने अपनी बेटी चंपावती के नाम पर बसाया था। देश-दुनिया से लोग इस उत्सव में शामिल होने आते हैं।
935 ईस्वी में हुई थी मिंजर मेले की शुरुआत
ऐतिहासिक लोककथाओं के अनुसार इस खास मेले की शुरुआत 935 ईस्वी में हुई थी। चंबा के राजा ने जब त्रिगर्त (अब कांगड़ा) के राजा पर जीत हासिल की थी, तब वह वापस लौटे थे। उनके लौटने पर स्थानीय लोगों ने मक्का, धान के मिंजर और ऋतुफल भेंट करके अपनी खुशी जाहिर की थी।
मिंजर मेले में दिखती है हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल
शाहजहां के समय राजा पृथ्वी सिंह रघुवीर जी को चंबा लाए थे। तब शाहजहां ने मिर्जा साफी बेग को राजदूत बनाकर भेजा था। मिर्जा ने जरी गोटे से मिंजर बनाकर रघुवीर जी और राजा को भेंट किया था। आज भी मुस्लिम समुदाय रेशम और मोतियों से विशेष मिंजर तैयार करता है।
यह मिंजर सबसे पहले रघुनाथ और लक्ष्मीनारायण मंदिर में चढ़ाया जाता है। आज भी मिर्जा परिवार का वरिष्ठ सदस्य ही भगवान रघुवीर को पहला मिंजर अर्पित करता है। इसके बाद ही यह मेला ऑफिशियल रूप से शुरू होता है। यह परंपरा चंबा के धर्म निरपेक्ष इतिहास को साफ तौर पर दर्शाती है।
ऐतिहासिक चौगान में निकलती है भगवान रघुवीर की भव्य रथयात्रा
मेले के पहले दिन भगवान रघुवीर जी की भव्य रथयात्रा ऐतिहासिक चौगान तक पहुंचती है। रथ को रस्सियों से खींचकर लाया जाता है। उनके साथ आसपास के 200 से अधिक देवी-देवता भी वहां मौजूद रहते हैं। पहले रियासत के राजा ऋतुफल और मिठाई भेंट करते थे, लेकिन अब प्रशासन यह जिम्मेदारी निभाता है।
मेले के दौरान स्थानीय आर्टिस्ट कूंजड़ी-मल्हार और ऋतुगीत गाकर पुरानी परंपरा को जिंदा रखते हैं। राजमहल अखंड चंडी से चौगान होते हुए रावी नदी तक मुख्य शोभायात्रा निकलती है। एक हफ्ते बाद लाल कपड़े में नारियल, एक रुपया, फल और मिंजर को रावी नदी में विसर्जित करके मेले का समापन होता है।