New Delhi News: डिजिटल समाचार पोर्टल न्यूजक्लिक और इसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ से जुड़े कथित विदेशी फंडिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। एजेंसी ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा दर्ज एफआईआर और ईडी की मनी लॉन्ड्रिंग जांच को रद्द कर दिया गया था।
डिजिटल समाचार प्लेटफॉर्म न्यूजक्लिक और उसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ से जुड़े कथित विदेशी फंडिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है। एजेंसी ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत न्यूजक्लिक और पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उससे जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच को निरस्त कर दिया गया था। ईडी का तर्क है कि हाईकोर्ट ने जांच में सामने आए महत्वपूर्ण साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष की दलीलों पर पूरी तरह विचार नहीं किया।
यह पूरा विवाद करीब 9.59 करोड़ रुपये के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई), न्यूजक्लिक को कथित तौर पर मिली करीब 92 करोड़ रुपये की अतिरिक्त विदेशी रकम और अमेरिकी उद्योगपति नेविल रॉय सिंघम से कथित संबंधों से जुड़ा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों को यदि पूरी तरह सही भी मान लिया जाए, तब भी धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के अनिवार्य कानूनी तत्व स्थापित नहीं होते। इसके विपरीत, ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट के इस आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया है।
क्या है पूरा मामला?
न्यूजक्लिक की मूल कंपनी पीपीके न्यूजक्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने 26 अगस्त 2020 को एफआईआर दर्ज की थी। इसमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात), धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत आरोप दर्ज किए गए थे।
ईडी के अनुसार, वर्ष 2018 में पीपीके न्यूजक्लिक को एक अमेरिकी कंपनी से एफडीआई के रूप में 9.60 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे। इसके एवज में कंपनी के शेयर 11,500 रुपये प्रति शेयर के मूल्य पर जारी किए गए। केंद्रीय एजेंसी का आरोप है कि इस रकम का संबंध चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े अमेरिकी नागरिक नेविल रॉय सिंघम से था। एजेंसी का दावा है कि इस निवेश का कथित उद्देश्य सूचना और प्रचार के जरिए वैचारिक प्रभाव स्थापित करना था।
इसी एफआईआर को आधार बनाते हुए ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। एजेंसी का आरोप था कि विदेशी फंडिंग के ढांचे, इसके उपयोग और निवेश संबंधी जानकारियों में कथित तौर पर गलत बयानी की गई थी।
हाईकोर्ट के फैसले पर ईडी के तर्क
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी विशेष अनुमति याचिका में ईडी ने दलील दी है कि जांच के दौरान जुटाए गए ईमेल, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेजों से विदेशी फंडिंग की कथित योजना और मंशा की गहन जांच जरूरी थी। एजेंसी का कहना है कि हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष की दलीलों और जांच के कुछ गंभीर पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
ईडी का यह भी तर्क है कि रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान मामले के गुण-दोष का ऐसा मूल्यांकन नहीं होना चाहिए था, जिससे जांच का दायरा सीमित हो जाए। एजेंसी के अनुसार, धोखाधड़ी के आरोप की जांच सिर्फ इस आधार पर बंद नहीं की जा सकती कि कथित निवेशक ने खुद कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई, बल्कि सार्वजनिक प्राधिकरणों के समक्ष गलत जानकारी देने के पहलू को भी देखा जाना चाहिए।
नेविल रॉय सिंघम कनेक्शन और 92 करोड़ रुपये का लेन-देन
जांच एजेंसियों के आरोपों में अमेरिकी नागरिक नेविल रॉय सिंघम की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। ईडी का दावा है कि न्यूजक्लिक को प्राप्त विदेशी राशि का सीधा संबंध सिंघम से जुड़ी कंपनियों और उनके नेटवर्क से था। एजेंसी ने आरोप लगाया था कि इस रकम का कथित इस्तेमाल चीन समर्थक प्रचार को बढ़ावा देने और वैचारिक प्रभाव बनाने के लिए किया गया।
इसके अलावा, ईडी ने यह भी रेखांकित किया कि 9.59 करोड़ रुपये के निवेश के अतिरिक्त न्यूजक्लिक को सिंघम से जुड़ी कंपनियों से लगभग 92 करोड़ रुपये मिले। एजेंसी का कहना है कि इस राशि को सेवाओं के निर्यात (सर्विसेज एक्सपोर्ट) के भुगतान के रूप में दिखाया गया था, लेकिन उन सेवाओं के वास्तविक अस्तित्व और दस्तावेजों पर गंभीर सवाल हैं। जांच एजेंसी का दावा है कि इस कथित विदेशी धन के एक हिस्से का इस्तेमाल प्रबीर पुरकायस्थ द्वारा दिल्ली के साकेत इलाके में स्थित एक फ्लैट खरीदने में भी किया गया था। इस मामले में करीब 4.93 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने किन आधारों पर रद्द की थी एफआईआर?
दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने 29 मई 2026 को न्यूजक्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एफआईआर और ईडी की जांच को निरस्त कर दिया था।
अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि यदि अभियोजन के सभी आरोपों को स्वीकार भी कर लिया जाए, तब भी आईपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता। अदालत ने रेखांकित किया कि अमेरिकी निवेशक संस्था वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स की तरफ से धोखाधड़ी की कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी।
आपराधिक विश्वासघात (धारा 406) के संदर्भ में अदालत का मानना था कि निवेश के बदले शेयर जारी करने के सामान्य व्यावसायिक लेनदेन को संपत्ति सौंपे जाने और उसके गबन का मामला नहीं माना जा सकता। वहीं आपराधिक साजिश (धारा 120बी) पर अदालत ने स्पष्ट किया था कि केवल किसी समझौते या व्यापारिक लेनदेन की मौजूदगी पर्याप्त नहीं है; किसी गैरकानूनी उद्देश्य या अवैध तरीके का ठोस प्रमाण सामने आना आवश्यक है।