बुलडोजर कार्रवाई पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों में मतभेद, दो साल की रोक और नोटिस के मुद्दे पर फैसला तीसरे जज को रेफर

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Prayagraj News: इलाहाबाद हाईकोर्ट की दो जजों की खंडपीठ ने हमीरपुर जिले में बुलडोजर कार्रवाई और पॉक्सो एक्ट से जुड़े मामले में मतभिन्नता के चलते सुनवाई को तीसरे जज के लिए रेफर कर दिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने दो प्रमुख कानूनी बिंदुओं पर अलग-अलग राय व्यक्त की है ।

पहला मतभेद इस बात पर रहा कि क्या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत एफआईआर के बाद दो साल तक ध्वस्तीकरण पर रोक लगाई जा सकती है या नहीं। दूसरा मतभेद नगरीय कानून के तहत कार्रवाई से एक साल पहले नोटिस देना अनिवार्य करने को लेकर हुआ। अब यह मामला मुख्य न्यायाधीश के पास तीसरे जज के गठन के लिए भेजा जाएगा ।

जस्टिस श्रीधरन ने दिया बुलडोजर जजमेंट का हवाला

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर जजमेंट का हवाला देते हुए कहा कि किसी आरोपी के घर को केवल आपराधिक मामला दर्ज होने के आधार पर गिराना गलत है। उन्होंने एफआईआर दर्ज होने की तारीख से दो वर्ष तक ध्वस्तीकरण पर रोक लगाने और एक साल पहले नोटिस देने की व्यवस्था देने की वकालत की ।

दूसरी तरफ, न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने इस राय से असहमति जताते हुए कहा कि हाईकोर्ट को दो साल जैसी निश्चित समयसीमा तय करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने आशंका जताई कि ऐसी छूट का दुरुपयोग तुच्छ एफआईआर दर्ज कराकर कानूनी सुरक्षा हासिल करने में किया जा सकता है, जो न्यायिक सक्रियता का दायरा बढ़ाएगा ।

दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने पर दोनों जज सहमत

हालांकि, दोनों न्यायाधीश इस बात पर पूरी तरह सहमत रहे कि अवैध निर्माण के मामलों में केवल आम नागरिक के निर्माण को गिराना काफी नहीं है। नोटिस जारी होने पर निर्माण को अनदेखा करने वाले विकास प्राधिकरण के दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत छह महीने में कार्रवाई पूरी की जानी चाहिए ।

अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने कोर्ट में बताया कि याचियों ने तथ्य छिपाए हैं। विवादित लॉज सिंचाई विभाग की जमीन पर बना है और वहीं 16 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म तथा धर्मांतरण की गंभीर घटना हुई थी। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल रिहायशी मकान पर कोई सीधी कार्रवाई प्रस्तावित नहीं है ।

Desh Raj
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