New Delhi News: वैश्विक कमोडिटी बाजार में साल 2026 की शुरुआत में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद चांदी की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की जा रही है। कॉमेक्स पर 122 डॉलर प्रति औंस के उच्चतम स्तर से फिसलकर भाव 51 डॉलर प्रति औंस के आसपास आ गए हैं। इस बड़ी बिकवाली ने निवेशकों के बीच 1980 और 2011 के ऐतिहासिक क्रैश की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
वैश्विक बाजार में साल 2026 के शुरुआती महीनों में ऐतिहासिक तेजी दर्ज करने वाली चांदी की कीमतों में अब भारी गिरावट देखने को मिल रही है। 29 जनवरी 2026 को कॉमेक्स (COMEX) पर चांदी 122 डॉलर प्रति औंस के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई थी, जिसके चलते भारतीय बाजार में भी इसके दाम करीब 4.20 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गए थे। उस समय विश्लेषक इसके 150 से 200 डॉलर तक जाने का अनुमान लगा रहे थे, लेकिन इसके बाद मुनाफावसूली और बिकवाली का दौर शुरू हो गया।
रिकॉर्ड स्तर से लगातार गिरते हुए 17 जुलाई को चांदी 55 डॉलर प्रति औंस के नीचे आ गई थी। अगस्त में सीमित सुधार के बाद अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में एक बार फिर बिकवाली का दबाव बढ़ा और पांच कारोबारी सत्रों में भाव फिसलकर करीब 51 डॉलर प्रति औंस पर आ गए।
सोने के मुकाबले चांदी पर बढ़ा बिकवाली का दबाव
23 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह के दौरान कॉमेक्स पर चांदी में करीब 6 प्रतिशत की बड़ी गिरावट देखी गई, जबकि इस दौरान सोने में लगभग 4 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि बाजार में समग्र सुस्ती के समय चांदी पर सोने की तुलना में अधिक दबाव बन रहा है।
वैश्विक वित्तीय ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली के विश्लेषकों के अनुसार, चांदी की कीमतों पर अमेरिकी डॉलर की चाल, ब्याज दरों के रुझान और संस्थागत निवेशकों के रुख का सीधा प्रभाव पड़ रहा है। इसके साथ ही सौर ऊर्जा (सोलर पैनल) और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र से आने वाली औद्योगिक मांग भी बाजार की दिशा तय कर रही है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि यदि दबाव बना रहा तो कीमतें 50 डॉलर प्रति औंस के स्तर से भी नीचे जा सकती हैं।
1980 में 90 फीसदी तक गिरी थीं कीमतें
चांदी के बाजार में मौजूदा सुस्ती ने 1980 के दौर की यादें ताजा कर दी हैं। जनवरी 1980 में चांदी की कीमत करीब 48 डॉलर प्रति औंस के उच्च स्तर पर पहुंची थी। इसके बाद शुरू हुई तेज बिकवाली के चलते जून 1982 तक इसके दाम गिरकर 4.80 डॉलर प्रति औंस रह गए थे। यानी महज ढाई वर्ष की अवधि में चांदी की कीमतों में करीब 90 प्रतिशत का ऐतिहासिक क्रैश देखा गया था और इसके बाद लंबे समय तक कीमतें निचले स्तर पर ही सीमित रहीं।
2011 की तेजी के बाद दर्ज हुई थी लंबी मंदी
साल 2011 में भी ऐसा ही रुख देखा गया था, जब अप्रैल 2011 में चांदी 49 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच गई थी। हालांकि, यह उछाल ज्यादा समय तक नहीं टिक सका और जून 2013 तक भाव घटकर 18 डॉलर तथा नवंबर 2015 तक 13 डॉलर प्रति औंस तक लुढ़क गए।
इसके बाद लगभग एक दशक तक वैश्विक बाजार में चांदी 11 से 35 डॉलर के दायरे में सीमित दायरे में कारोबार करती रही। अप्रैल 2025 से शुरू हुई नई तेजी के दम पर यह जनवरी 2026 में 122 डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंची थी, लेकिन अब मौजूदा गिरावट ने एक बार फिर बाजार की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।