Kullu News: अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा आज देश-विदेश के कलाकारों की शानदार प्रस्तुतियों और भव्य आयोजनों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। हालांकि, कभी इस ऐतिहासिक उत्सव की असली पहचान यहां की समृद्ध लोककलाएं, पारंपरिक स्वांग और पुरानी सांस्कृतिक धरोहर हुआ करती थी जो समय के साथ अब धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है।
दशहरे की रातों में कभी हर टेंट के पास हौरण स्वांग का आयोजन होता था। इसके अलावा चंद्रावली और बाठड़ा नृत्य इस मेले की मुख्य रौनक बढ़ाते थे। समय के दौर के साथ इन प्राचीन लोक परंपराओं का आकर्षण काफी घटा है और कई प्रस्तुतियां अब केवल औपचारिकता या परंपरा निभाने तक ही सीमित रह गई हैं।
हौरण स्वांग और लद्दाख से इसका पुराना नाता
इन परंपराओं का अस्तित्व आज भी लोक संस्कृति की जीवंत विरासत के रूप में कायम है। हौरण स्वांग में दो कलाकार हिरण की प्रतीकात्मक वेशभूषा पहनकर नृत्य करते हैं। इसे भगवान राम के स्वर्ण मृग प्रसंग से भी जोड़ा जाता है। हालांकि इसके उद्भव को लेकर एक अन्य मत यह भी है कि इसकी शैली लद्दाख के ड्रैगन नृत्य से मिलती-जुलती है।
पुराने समय में लद्दाख और यारकंद से व्यापारी कुल्लू व्यापार के लिए आते थे, जिससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान होना स्वाभाविक था। पुराने गजट और ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार कुल्लू दशहरा कभी सिर्फ पांच दिनों का होता था, जो समय के साथ बदलकर आज एक भव्य अंतरराष्ट्रीय उत्सव का रूप ले चुका है।
दो राजाओं के दरबार और बदलती परंपराएं
कभी कुल्लू दशहरे में भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर के अलावा कुल्लू राजपरिवार और शांगरी रियासत के राजा का शाही दरबार भी सजता था। वर्ष 1964 में शांगरी राजा रघुवीर सिंह के निधन के बाद दूसरा राजदरबार इस उत्सव से हमेशा के लिए विलुप्त हो गया। वर्तमान कलाकेंद्र वाले स्थान पर कभी वृज शैली की प्रस्तुतियां हुआ करती थीं।
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. सुरत राम ठाकुर का कहना है कि दशहरा उत्सव में हर टेंट के पास पहले हौरण स्वांग होता था। आज यह बहुत जरूरी है कि इन पुरानी परंपराओं को केवल औपचारिकता न मानकर नई पीढ़ी से जोड़ा जाए, ताकि कुल्लू की मूल सांस्कृतिक पहचान आने वाले समय में भी पूरी तरह जीवित रह सके।