Himachal News: हिमाचल प्रदेश में बदलते मौसम और प्राकृतिक आपदाओं के बीच अब ग्रामीण क्षेत्रों ने राहत का इंतजार करने के बजाय खुद से बचाव और बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर (CEEW) के एक नए अध्ययन के अनुसार, मंडी, कुल्लू, सिरमौर और शिमला जिलों की 12 ग्राम पंचायतों के लोगों ने खेती के तरीके बदलने और जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने की अनूठी पहल की है।
सेब और अनार छोड़ नई फसलों की ओर बढ़ रहे किसान
जलवायु परिवर्तन का असर पहाड़ी खेती पर साफ दिखाई दे रहा है। कम बर्फबारी और फसलों में बीमारियों के बढ़ते खतरे के कारण किसानों ने अपनी फसलें बदलनी शुरू कर दी हैं। अध्ययन के मुताबिक, कुल्लू के बजौरा में किसानों ने सेब के बाद अनार की खेती की थी, लेकिन अब वायरस का प्रकोप बढ़ने के कारण वे पर्सिमन (जापानी फल) अपना रहे हैं। वहीं, शिमला के संधू गांव में प्राकृतिक खेती का दायरा तेजी से बढ़ा है, जिससे किसानों को बेहतर मुनाफा हो रहा है और फसलें मौसम की मार से सुरक्षित रह रही हैं। इसके अलावा, सिरमौर के पराड़ा गांव में भी किसान लहसुन के साथ सेब की खास किस्मों की खेती कर अपनी आमदनी को सुरक्षित कर रहे हैं।
महिलाओं ने पुनर्जीवित की सूखती बावड़ियां
पहाड़ों में पानी की किल्लत से निपटने के लिए सिरमौर के थाना कशोगा गांव की महिलाओं ने सराहनीय कदम उठाया है। कभी इस गांव में 35 बारहमासी बावड़ियां थीं, जो घटकर सिर्फ 10 रह गई थीं। विभिन्न संस्थानों से प्रशिक्षण मिलने के बाद महिलाओं ने इनकी नियमित सफाई और देखभाल शुरू की, जिससे अब तक पांच जलस्रोत पूरी तरह बहाल हो चुके हैं, जबकि अन्य पर काम जारी है।
आपदा से पहले तैयारी और सामुदायिक सहयोग
शिमला के पास स्थित शोगी गांव ने वर्ष 2023 की आपदा के बाद सबक लेते हुए गांव में आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया है। यहां ग्रामीणों को प्राथमिक उपचार और आपात स्थिति में एक-दूसरे की मदद करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। CEEW और ICIMOD के इस अध्ययन में खेती, जल प्रबंधन और आपदा तैयारी से जुड़े 25 उपायों का सुझाव दिया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल में वर्ष 2020 से 2025 के बीच आपदाओं से 21,097 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जिसके मद्देनजर अब राहत के साथ-साथ बचाव और पूर्व चेतावनी प्रणालियों पर विशेष जोर दिया जा रहा है।