Mumbai News: 29 अक्टूबर को विश्व स्ट्रोक दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने स्ट्रोक को एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी बताते हुए समय पर उपचार पर जोर दिया है। मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं में रुकावट या उनके फटने से होने वाले स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों को B.E. F.A.S.T. फॉर्मूले से पहचान कर तुरंत उचित अस्पताल पहुंचाना मरीज की जान और कार्यक्षमता बचाने में निर्णायक साबित होता है।
स्ट्रोक एक गंभीर और जानलेवा मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें इलाज शुरू करने में हुई थोड़ी-सी देरी भी मरीज के जीवन और स्वास्थ्य को गंभीर जोखिम में डाल सकती है। मस्तिष्क तक रक्त और ऑक्सीजन ले जाने वाली रक्त वाहिकाओं में रुकावट आने या उनके फटने के कारण स्ट्रोक की स्थिति पैदा होती है। ऑक्सीजन के अभाव में मस्तिष्क की कोशिकाएं तेजी से नष्ट होने लगती हैं। हर साल 29 अक्टूबर को ‘विश्व स्ट्रोक दिवस’ मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को स्ट्रोक के लक्षणों, त्वरित प्राथमिक उपचार और रोकथाम के उपायों के प्रति जागरूक करना है।
मुंबई स्थित सर एच. एन. रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल में न्यूरोइंटरवेंशनल सर्जरी के डायरेक्टर डॉ. विपुल गुप्ता के अनुसार, स्ट्रोक की स्थिति में समय पर उपचार न मिलने से मरीज को स्थायी लकवा, बोलने व समझने में परेशानी, चलने-फिरने में असमर्थता या जान गंवाने तक का जोखिम हो सकता है। स्ट्रोक प्रबंधन में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अक्सर मरीज और उनके स्वजन शुरुआती संकेतों को सामान्य कमजोरी, चक्कर या थकान समझकर अनदेखा कर देते हैं।
B.E. F.A.S.T. फॉर्मूला: स्ट्रोक की पहचान का सरल तरीका
स्ट्रोक के आपातकालीन लक्षणों को पहचानने के लिए ‘B.E. F.A.S.T.’ फॉर्मूले का उपयोग किया जाता है:
- B – Balance (संतुलन): अचानक शरीर का संतुलन बिगड़ना, लड़खड़ाहट होना या चलने-फिरने में कठिनाई महसूस होना।
- E – Eyes (आंखें): आंखों के आगे अचानक अंधेरा छाना, धुंधला दिखाई देना, दोहरी दृष्टि (डबल विजन) या नजर कमजोर होना।
- F – Face (चेहरा): चेहरे का एक तरफ झुक जाना या मुस्कुराने का प्रयास करने पर दोनों तरफ समान हलचल न होना।
- A – Arms (हाथ-पैर): किसी एक हाथ या पैर में अचानक सुन्नपन, कमजोरी या उसे उठाने में परेशानी होना।
- S – Speech (बोलना): बोलने में लड़खड़ाहट, आवाज अस्पष्ट होना या दूसरों की बातों को समझने में असमर्थता।
- T – Time (समय): इन लक्षणों में से कोई भी दिखते ही बिना समय गंवाए तत्काल आपातकालीन चिकित्सा सहायता प्राप्त करना।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार ये लक्षण कुछ मिनटों में अपने आप ठीक हो जाते हैं, जिसे ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (टीआईए) कहा जाता है। इसे भविष्य में आने वाले गंभीर स्ट्रोक की पूर्व चेतावनी माना जाता है, इसलिए ऐसे मामलों में भी तुरंत न्यूरोलॉजिकल जांच करानी चाहिए।
लक्षण दिखने पर क्या करें और किन बातों से बचें
स्ट्रोक के लक्षण दिखते ही तुरंत एंबुलेंस बुलाएं और मरीज को सीधे ऐसे अस्पताल ले जाएं जहां स्ट्रोक के उन्नत इलाज और न्यूरो-केयर की सुविधा उपलब्ध हो। लक्षण पहली बार किस समय दिखे या मरीज आखिरी बार कब पूरी तरह स्वस्थ था, उस सटीक समय को जरूर नोट कर लें। यह समय डॉक्टरों को उचित दवा व थेरेपी देने का निर्णय लेने में मदद करता है।
मरीज के खुद-ब-खुद ठीक होने की प्रतीक्षा बिल्कुल न करें। मरीज को खाने या पीने के लिए पानी, चाय या कोई ठोस वस्तु न दें, क्योंकि स्ट्रोक में भोजन निगलने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और चीजें सांस की नली में अटक सकती हैं। बिना डॉक्टर की जांच के मरीज को एस्पिरिन या अन्य कोई भी दवा अपनी मर्जी से न दें। स्ट्रोक रक्त का थक्का जमने (इस्केमिक) और मस्तिष्क में नस फटने (हेमरेजिक) दोनों से हो सकता है, और दोनों स्थितियों के उपचार के तरीके पूरी तरह भिन्न होते हैं।
आधुनिक चिकित्सा तकनीकों से बेहतर हुए रिकवरी के अवसर
चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति ने स्ट्रोक के उपचार को अधिक प्रभावी बना दिया है। यदि मरीज समय पर विशेषज्ञ डॉक्टर तक पहुंच जाए, तो मस्तिष्क को होने वाले नुकसान को सीमित कर पूरी रिकवरी की संभावनाएं बढ़ जाती हैं:
- क्लॉट घोलने वाली दवाएं (थ्रोम्बोलिसिस): रक्त का थक्का बनने से होने वाले इस्केमिक स्ट्रोक में उपयुक्त पाए जाने वाले मरीजों को ‘एल्टेप्लेस’ या ‘टेनेक्टेप्लेस’ जैसी थक्का घोलने वाली दवाएं दी जाती हैं। यह थेरेपी सामान्यतः लक्षण दिखने के साढ़े चार घंटे के भीतर दी जानी चाहिए।
- मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी: मस्तिष्क की बड़ी रक्त वाहिका में थक्का अटकने की स्थिति में यह एंडोवैस्कुलर प्रक्रिया की जाती है। इसमें कैथेटर को रक्त वाहिका के जरिए दिमाग तक पहुंचाकर विशेष स्टेंट या उपकरण से थक्के को बाहर निकाला जाता है, जिससे तुरंत रक्त प्रवाह सामान्य हो जाता है।
- उन्नत ब्रेन इमेजिंग: सीटी एंजियोग्राफी, सीटी परफ्यूजन और एमआरआई जैसी जांचों के जरिए रक्त प्रवाह में रुकावट, क्षतिग्रस्त हिस्से और बचाए जा सकने वाले मस्तिष्क ऊतकों का सटीक आकलन किया जाता है।
- रक्तस्राव का प्रबंधन: रक्त वाहिका फटने या ब्रेन एन्यूरिज्म के टूटने पर रक्तचाप को तुरंत नियंत्रित किया जाता है, खून पतला करने वाली दवाओं के असर को रोका जाता है और आवश्यकतानुसार तत्काल न्यूरोसर्जिकल या एंडोवैस्कुलर प्रक्रियाएं की जाती हैं।
स्ट्रोक से बचाव के आवश्यक उपाय
स्ट्रोक के जोखिम से बचने के लिए उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर), मधुमेह (डायबिटीज) और बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को दवाओं व जीवनशैली के जरिए नियंत्रित रखना अनिवार्य है। धूम्रपान, तंबाकू और शराब के सेवन से दूर रहें। दैनिक दिनचर्या में नियमित व्यायाम व पैदल चलना शामिल करें, संतुलित व पौष्टिक आहार लें और हृदय रोगों की समय पर जांच व उपचार कराएं। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण से स्ट्रोक के संभावित जोखिम कारकों की पहचान समय रहते की जा सकती है।