पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट से ईडी को झटका, मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 8 आरोपितों की जमानत रद्द करने की याचिका खारिज

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Chandigarh News: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को बड़ा झटका देते हुए मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आठ आरोपितों की जमानत रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में देने की बाध्यता कानून में पहले से मौजूद थी, लिहाजा सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले की आड़ लेकर पुरानी गिरफ्तारियों में मिली राहत को चुनौती नहीं दी जा सकती।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस संजय वशिष्ठ की पीठ ने 28 अक्टूबर को फैसला सुनाते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की सभी आठों याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके साथ ही पंचकूला की विशेष अदालत से आरोपितों को मिली नियमित जमानत को बरकरार रखा गया है।

अदालत में आरोपितों की ओर से पेश वकील सजल बंसल और दीपांशु बंसल ने दलील दी कि ईडी ने किसी भी आरोपित पर जमानत की शर्तों के उल्लंघन या अदालत से मिली कानूनी राहत के दुरुपयोग का कोई आरोप नहीं लगाया है। ऐसे में जमानत रद्द करने का कोई ठोस आधार नहीं बनता।

पंचकूला में जबरन वसूली और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है मामला

यह पूरा मामला पंचकूला में दर्ज जबरन वसूली और धनशोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) की जांच से जुड़ा है। ईडी ने मामले के आरोपितों चंद्रशेखर, साहिल भल्ला, नरेश कुमार श्योकंद, अश्वनी कुमार उर्फ अश्वनी शर्मा, आकाश भल्ला, निर्मल सिंह, नरिंदर खिल्लन और अनिल भल्ला की जमानत रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

निचली अदालत ने इन सभी आरोपितों को इस आधार पर जमानत दी थी कि गिरफ्तारी के समय जांच एजेंसी द्वारा उन्हें गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए गए थे।

ईडी की दलीलों पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान ईडी ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने 3 अक्टूबर 2023 को ‘पंकज बंसल बनाम भारत संघ’ मामले में गिरफ्तारी के आधार लिखित में देने की अनिवार्यता तय की थी। ऐसे में इस व्यवस्था से पहले हुई गिरफ्तारियों के आधार पर दिए गए जमानत आदेशों की समीक्षा होनी चाहिए।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 19 के तहत गिरफ्तारी का कारण बताना कानून में पहले से अनिवार्य था। सुप्रीम कोर्ट ने केवल यह व्यवस्था तय की थी कि एजेंसी जरूरत पड़ने पर अदालत में इसका अनुपालन साबित कर सके, इसलिए जानकारी लिखित रूप में दी जानी चाहिए।

समान परिस्थितियों में भेदभाव की आशंका

अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यदि ईडी के इस तर्क को स्वीकार किया गया, तो पहले से जमानत पा चुके मामलों को दोबारा खोलने और आदेशों की समीक्षा का रास्ता खुल जाएगा। इससे समान परिस्थितियों वाले आरोपितों के बीच भेदभाव की स्थिति उत्पन्न होगी। पीठ ने इस बात को भी रेखांकित किया कि ईडी की ओर से आरोपितों द्वारा कानूनी राहत का गलत इस्तेमाल करने का कोई प्रमाण पेश नहीं किया गया है।

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