Shimla News: ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद (CEEW) और एकीकृत पर्वतीय विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय केंद्र (ICIMOD) के एक नए अध्ययन से यह खुलासा हुआ है कि हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण इलाके जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए अब खुद आगे आकर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। राज्य के मंडी, कुल्लू, शिमला और सिरमौर जिलों की 12 ग्राम पंचायतों पर आधारित इस शोध में समुदाय-नेतृत्व वाले अनुकूलन के कुल 25 महत्वपूर्ण उपाय सामने आए हैं।
सेब की खेती से परसिमोन तक बदलाव और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन
अध्ययन के मुताबिक, बढ़ते तापमान और जलवायु बदलाव के कारण किसानों ने सेब की पारंपरिक खेती के विकल्प के रूप में परसिमोन (जापानी फल) की खेती की ओर रुख करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, गांवों में प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर अपनाया जा रहा है, पारंपरिक जल स्रोतों जैसे झरनों से भरी ‘बावड़ियों’ को पुनर्जीवित किया जा रहा है और ग्रामीण स्तर पर आपदा से निपटने के लिए विशेष तैयारी समितियों को मजबूत किया जा रहा है। यह शोध इस बात पर जोर देता है कि स्थानीय समुदाय अक्सर जलवायु प्रभावों के सबसे पहले उत्तरदाता होते हैं, जो जमीनी स्तर पर बेहद व्यावहारिक और उपयोगी रणनीतियाँ विकसित कर रहे हैं।
विशेषज्ञों ने की संस्थागत और तकनीकी सहायता की वकालत
शिमला में आयोजित एक विशेष चर्चा के दौरान CEEW की कार्यक्रम प्रमुख श्रेया वधवान ने बताया कि हाल के दिनों में जलवायु प्रभावों की तीव्रता काफी बढ़ी है, जिससे आम लोगों की दैनिक आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है। इस बैठक में सरकारी अधिकारियों, वैज्ञानिकों और स्थानीय निवासियों ने एक साथ मिलकर इन निष्कर्षों पर विचार-विमर्श किया और संस्थागत व तकनीकी सहायता के जरिए सामुदायिक पहलों को बढ़ावा देने के तरीकों पर चर्चा की।
वहीं, ICIMOD की डॉ. अमिना महारजन ने हिमालयी क्षेत्रों में आने वाली आपदाओं की बढ़ती जटिलता पर गहरी चिंता जताई, जहां अक्सर एक साथ कई खतरे सामने आ जाते हैं। उन्होंने विशेष रूप से दूरदराज के पहाड़ी गांवों के लिए मजबूत निगरानी, पूर्वानुमान और आपदा पूर्व तैयारी प्रणालियों की सख्त जरूरत बताई। अध्ययन में यह भी सिफारिश की गई है कि ग्राम पंचायत विकास योजनाओं में जलवायु अनुकूलन को अनिवार्य रूप से एकीकृत किया जाना चाहिए, ताकि इन महत्वपूर्ण स्थानीय प्रयासों को मौजूदा सरकारी योजनाओं के जरिए व्यापक समर्थन मिल सके।