Shimla News: संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर बुधवार को हिमाचल किसान सभा ने शिमला में जोरदार प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के विरोध में जिलाधीश कार्यालय के बाहर धरना दिया। किसान नेताओं का दावा है कि इस समझौते से देश के कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान होगा।
प्रदर्शन को संबोधित करते हुए कसुम्पटी किसान सभा अध्यक्ष जय शिव ठाकुर, सीटू प्रदेशाध्यक्ष विजेंद्र मेहरा और कोषाध्यक्ष जगत राम ने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित इस ट्रेड समझौते का ड्राफ्ट तैयार हो चुका है। इस पर किसी भी समय दोनों देशों की सहमति बन सकती है।
कॉरपोरेट खेती मॉडल और अनुदान पर उठाए सवाल
किसान नेताओं ने कहा कि अमेरिका, यूरोपीय देशों और न्यूजीलैंड में कॉरपोरेट खेती का मॉडल लागू है। वहां बहुत कम लोग खेती करते हैं और उन्हें सरकार से भारी सब्सिडी मिलती है। इसके विपरीत भारत में बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है, लेकिन यहां किसानों को सीधे तौर पर पर्याप्त आर्थिक मदद नहीं मिल पाती।
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि कृषि क्षेत्र में मिलने वाली सरकारी मदद का बड़ा फायदा केवल बड़ी कंपनियों को मिल रहा है। इस प्रस्तावित समझौते के तहत भारतीय सामान पर विदेश में ज्यादा टैक्स लगेगा। इसके उलट भारत में आने वाले विदेशी सामान पर कम टैक्स रखने की तैयारी की जा रही है।
कृषि और डेयरी उत्पादों पर पड़ेगा बुरा असर
किसान नेताओं का दावा है कि इस नीति से देश के कपास, बासमती चावल, दुग्ध उत्पाद और फलों पर असर पड़ेगा। इसके अलावा कपड़ा, केमिकल, जेनेरिक दवाएं, चाय, कॉफी, काजू और मसालों के कारोबार पर भी विपरीत प्रभाव दिखेगा। इससे भारत का पूरा कृषि बाजार बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
वक्ताओं ने याद दिलाया कि वर्ष 2014 में किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य का वादा किया गया था। वह वादा आज तक अधूरा है। लंबे आंदोलन के बाद सरकार को तीन कृषि कानून वापस लेने पड़े थे। अब फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के जरिए किसानों के हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो रही है।
दिल्ली में 29 जुलाई को बनेगी आगे की रणनीति
किसान सभा के नेताओं ने कहा कि अखिल भारतीय किसान सभा के आह्वान पर पूरे देश में इसका विरोध जारी है। आगामी 29 जुलाई को दिल्ली में बड़ी बैठक होगी। इसमें किसान, मजदूर और आम लोग मिलकर केंद्र सरकार के खिलाफ अगले राष्ट्रव्यापी आंदोलन की पूरी रूपरेखा तैयार करेंगे।
प्रदर्शनकारियों ने सरकार की आर्थिक नीतियों की तीखी आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि बीते 12 वर्षों में मेहनतकश तबके की अनदेखी हुई है। देश में आर्थिक असमानता काफी बढ़ी है। देश की अधिकांश संपत्ति कुछ बड़े उद्योग घरानों तक सिमट कर रह गई है, जबकि आम जनता परेशान है।
