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कोरोना वैक्‍सीन न जाने कब होगी तैयार, रिसर्चर्स बोले- इम्‍युनिटी डेवलप करने में मास्‍क मददगार!

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कोरोना वायरस वैक्‍सीन तैयार होने तक सावधानी ही इस महामारी से बचने का उपाय है। दुनियाभर में कई वैक्‍सीन का इंसानों पर ट्रायल चल रहा है मगर उनके अगले साल की शुरुआत से पहले तक आने की संभावना कम ही है। वैक्‍सीन लॉन्‍च हो जाने पर हर देश में उसकी पर्याप्‍त सप्‍लाई पहुंचने में लंबा वक्‍त लग सकता है। ऐसे में साइंटिस्‍ट्स कुछ और उपायों पर भी गौर कर रहे हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना काल में मास्‍क पहनने से इम्‍युनिटी डेवलप हो सकती है और कोविड संक्रमण धीमा हो सकता है। उन्‍होंने कहा कि मास्‍क वायरस के संक्रमणकारी हिस्‍से को फिल्‍टर कर सकते हैं लेकिन पूरी तरह नहीं रोक सकते। ऐसे में कोरोना इन्‍फेक्‍शन होगा तो जरूर लेकिन वह घातक नहीं होगा। एक तरह से यह भयंकर बुखार के बजाय हल्‍का बुखार सहने जैसा है।

चेचक की तर्ज पर कोरोना से बचाव कैसे?

न्‍यू इंग्‍लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की मोनिका गांधी और जॉर्ज रदरफोर्ड ने यह विचार सामने रखा है। चेचक की वैक्‍सीन बनने तक लोग वैरियोलेशन लेते थे। इसमें जिनको बीमारी नहीं होती थी, उन्‍हें चेचक मरीजों की पपड़ी के मैटीरियल के संपर्क में लाया जाता था। इससे हल्‍का इन्‍फेक्‍शन होता था लेकिन पूरी तरह बीमारी होने से बचा लेता था। साइंटिस्‍ट्स कोविड में भी ऐसी ही संभावना देख रहे हैं। इसके पीछे वायरल पैथोजेनेसिस की पुरानी थिअरी है जो कहती है कि बीमारी की गंभीरता इसपर निर्भर करती है कि वायरस इनोक्‍युलम (वायरस का संक्रमणकारी हिस्‍सा) शरीर में कितना गया है।

चूहों पर रिसर्च में कारगर रहा मास्‍क

गांधी और रदरफोर्ड का कहना है कि अगर कोविड इन्‍फेक्‍शन की गंभीरता भी वायरल इनोक्‍युलम पर निर्भर करती है तो फेस मास्‍क पहनकर बचाव हो सकता है। इससे वायरस का कुछ असर कम हो जाएगा। स्‍टडी में दोनों ने कहा, “चूंकि मास्‍क वायरस की मौजूदगी वाली कुछ ड्रॉपलेट्स को फिल्‍टर कर सकता है, ऐसे में मास्‍क पहनने से किसी व्‍यक्ति के शरीर में इनोक्‍युलम कम हो सकता है।” चूहों पर एक प्रयोग के नतीजों से इस थिअरी को समर्थन भी मिला है। पता चला कि जिन चूहों ने मास्‍क पहनना था, उन्‍हें इन्‍फेक्‍शन होने की संभावना या तो कम रही या फिर बेहद हल्‍का इन्‍फेक्‍शन हुआ।

इन्‍फेक्‍शन को कमजोर कर सकता है मास्‍क

दोनों साइंटिस्‍ट्स ने कहा, “वैक्‍सीन से उम्‍मीदें न सिर्फ इन्‍फेक्‍शन रोकने की होती हैं, बल्कि अधिकतर वैक्‍सीन ट्रायल में बीमारी की गंभीरता को घटा देती हैं, यानी ऐसे केसेज बढ़ जाते हैं कि जिनमें बीमारी कमजोर या बिना लक्षण वाली होती है।” दोनों साइंटिस्‍ट्स ने कहा कि उनकी थिअरी है कि नए वायरल इन्‍फेक्‍शन की दर कम करने से, वैसे लोगों का अनुपात बढ़ेगा जो एसिम्‍प्‍टोमेटिक रहते हैं। उन्‍होंने अर्जेंटीना के एक क्रूज शिप का हवाला दिया जिसके पैसेंजर्स को सर्जिकल और N95 मास्‍क दिए गए थे। इससे पहले जहाजों पर सामान्‍य मास्‍क पहनने पर 20% मरीज एसिम्‍प्‍टोमेटिक केस मिलते थे, जबकि इस जहाज पर खास मास्‍क दिए जाने पर 81% लोग एसिम्‍प्‍टोमेटिक पाए गए।

कोरोना से बचना है तो मास्‍क जरूर पहनें

इंस्टिट्यूट ऑफ लिवर एंड बाइलरी साइंसेज के डॉ एसके सरीज ने कहा कि इस रिसर्च पेपर ने यह समझाया है कि कैसे दिल्‍ली की 29% आबादी ऐंटीबॉडी पॉजिटिव थी मगर कभी इन्‍फेक्‍शन नहीं हुआ। उन्‍होंने कहा, “मास्‍क पहनने से वायरस की बहुत कम मात्रा शरीर में प्रवेश कर सकती है और वैक्‍सीन जैसा असर कर सकती है यानी असल में इन्‍फेक्‍शन हुए बिना भी ऐंटीबॉडी बन सकती हैं।”

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