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प्रवासी मजदूरों की वापसी: सुप्रीम कोर्ट केंद्र और राज्यों को 15 दिन का समय देगा

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घरों को लौटते प्रवासी मजदूर
– फोटो : PTI

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प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई की। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि वह रास्ते में फंसे हुये प्रवासी कामगारों को उनके पैतृक स्थानों तक पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्यों को 15 दिन का वक्त देने की सोच रहा है। इसके साथ ही अदालत ने राज्यों को प्रवासी मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने के भी निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने कहा कि इन कामगारों के पंजीकरण और रोजगार के अवसरों सहित सारे मसले पर नौ जून को आदेश सुनाएगा।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने पलायन कर रहे प्रवासी कामगारों की दयनीय स्थिति का स्वत: संज्ञान लिए गए मामले की वीडियो कांफ्रेन्सिंग के माध्यम से सुनवाई की। पीठ ने इस दौरान कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे इन श्रमिकों की पीड़ा कम करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों का भी संज्ञान लिया।

पीठ ने कहा कि वह इन प्रवासी कामगारों को पहुंचाने और उनके पंजीकरण और उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था के लिए केंद्र और सभी राज्यों को 15 दिन का समय देने की सोच रही है।  

सरकार का पक्ष
आज याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अभी तक करीब एक करोड़ प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाया गया है। उन्होंने शीर्ष अदालत को बताया कि इनमें से करीब 41 लाख मजदूरों को सड़क मार्ग और 57 लाख मजदूरों को ट्रेनों से उनके गृह राज्य भेजा गया है। 

मेहता ने कहा कि अधिकतर ट्रेनों का संचालन उत्तर प्रदेश और बिहार की तरफ हुआ है। उन्होंने अदालत को बताया कि इन कामगारों को उनके पैतृक स्थान पहुंचाने के लिए तीन जून तक 4200 से ज्यादा श्रमिक ट्रेनें चलाई गईं।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हम राज्यों से संपर्क में हैं और राज्य सरकारें ही अदालत को प्रवासियों की सही संख्या के बारे में बता सकती हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें अदालत को बता सकती हैं कितने प्रवासियों को अभी घर पहुंचाना है और इसके लिए कितनी ट्रेनों की आवश्यकता पड़ेगी। राज्यों ने एक चार्ट तैयार किया है, क्योंकि वे ऐसा करने के लिए सबसे अच्छी स्थिति में थे। 

देश की शीर्ष अदालत ने राज्यों द्वारा तैयार चार्ट को देखने के बाद कहा कि इसके अनुसार महाराष्ट्र की तरफ से केवल एक चार्ट की मांग की गई है। इसके जवाब में मेहता ने कहा कि महाराष्ट्र से हमने पहले ही 802 ट्रेनों को संचालित किया है। फिलहाल एक ट्रेन के लिए अनुरोध किया गया है। 

सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि किसी भी राज्य द्वारा ट्रेनों की मांग किए जाने पर केंद्र सरकार 24 घंटे के भीतर ट्रेनों को वहां भेजेगी। इस पर कोर्ट ने कहा कि हम सभी राज्यों से कहेंगे कि वह अपनी ट्रेनों की मांग को रेलवे को सौंपे। 

बता दें कि शीर्ष अदालत ने 28 मई को निर्देश दिया था कि अपने पैतृक स्थान जाने के इच्छुक सभी प्रवासी कामगारों से ट्रेन या बसों का किराया नहीं लिया जाए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि रास्ते में फंसे श्रमिकों को संबंधित प्राधिकारी नि:शुल्क भोजन और पानी मुहैया कराएंगे।

दिल्ली सरकार की ओर से बताया गया कि दिल्ली में दो लाख मजदूर हैं जो वापस नहीं जाना चाहते। बिहार सरकार ने बताया कि 28 लाख लोग वापस आ गए हैं। बिहार सरकार ने 10 लाख लोगों की स्किल मैपिंग की है ताकि उन्हें नौकरी दी जा सके।

महाराष्ट्र ने इस्तेमाल की 800 ट्रेनें, अब एक और की मांग

पीठ ने महाराष्ट्र से यह जानना चाहा कि महाराष्ट्र ने कितनी ट्रेनें मांगी थी। जवाब में मेहता ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार 800 ट्रेनों का इस्तेमाल कर चुकी है। फिलहाल सिर्फ एक ट्रेन की मांग है। महाराष्ट्र सरकार ने पीठ को बताया कि 11 लाख मजदूरों को वापस भेजा जा चुका है। अभी 38 हजार को और भेजा जाना है। वहीं गुजरात सरकार ने कहा कि 22 लाख में से 20.5 लाख लोगों को वापस भेजा जा चुका है।

यूपी सरकार ने कहा कि हमने किसी श्रमिक से कोई किराया नहीं लिया। हमने 21 लाख 69 हजार लोगों को वापस बुलाया है। दिल्ली से हमारी सीमा में साढ़े पांच लाख लोग वापस आए हैं। पश्चिम बंगाल सरकरा का कहना था कि 3.97 लाख प्रवासी मजदूर
अभी भी मौजूद हैं और शिविर में एक लाख हैं जिनको खाना पानी दिया जा रहा है। केरल सरकार का कहना था कि राज्य में चार लाख 34 हजार प्रवासी मजदूर थे, इनमें एक लाख वापस अपने गांव जा चुके हैं। 2.5 लाख और वापस जाना चाहते हैं। बाकी नहीं जाना चाहते।

 मजदूर संगठन ने कहा, रजिस्ट्रेशन प्रणाली नहीं कर रही काम

वहीं मजदूर संगठन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कॉलिन गॉन्जाल्विस ने कहा कि प्रवासियों का रजिस्ट्रेशन नहीं है और न ही रजिस्ट्रेशन प्रणाली काम कर रही है। ऐसे में प्रवासी मजदूर बेहद अवसाद में हैं। गॉन्जाल्विस ने आगे कहा कि जिनमे कोरोना लक्षण नहीं है उन्हें होम क्वारंटीन में रखा जाए और जिन्हें लक्षण हैं उन्हें क्वारंटीन सेंटर में रखा जाए।

प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई की। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि वह रास्ते में फंसे हुये प्रवासी कामगारों को उनके पैतृक स्थानों तक पहुंचाने के लिए केंद्र और राज्यों को 15 दिन का वक्त देने की सोच रहा है। इसके साथ ही अदालत ने राज्यों को प्रवासी मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने के भी निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने कहा कि इन कामगारों के पंजीकरण और रोजगार के अवसरों सहित सारे मसले पर नौ जून को आदेश सुनाएगा।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम आर शाह की पीठ ने पलायन कर रहे प्रवासी कामगारों की दयनीय स्थिति का स्वत: संज्ञान लिए गए मामले की वीडियो कांफ्रेन्सिंग के माध्यम से सुनवाई की। पीठ ने इस दौरान कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में फंसे इन श्रमिकों की पीड़ा कम करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा उठाए गए कदमों का भी संज्ञान लिया।

पीठ ने कहा कि वह इन प्रवासी कामगारों को पहुंचाने और उनके पंजीकरण और उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था के लिए केंद्र और सभी राज्यों को 15 दिन का समय देने की सोच रही है।  

सरकार का पक्ष
आज याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अभी तक करीब एक करोड़ प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक पहुंचाया गया है। उन्होंने शीर्ष अदालत को बताया कि इनमें से करीब 41 लाख मजदूरों को सड़क मार्ग और 57 लाख मजदूरों को ट्रेनों से उनके गृह राज्य भेजा गया है। 

मेहता ने कहा कि अधिकतर ट्रेनों का संचालन उत्तर प्रदेश और बिहार की तरफ हुआ है। उन्होंने अदालत को बताया कि इन कामगारों को उनके पैतृक स्थान पहुंचाने के लिए तीन जून तक 4200 से ज्यादा श्रमिक ट्रेनें चलाई गईं।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हम राज्यों से संपर्क में हैं और राज्य सरकारें ही अदालत को प्रवासियों की सही संख्या के बारे में बता सकती हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें अदालत को बता सकती हैं कितने प्रवासियों को अभी घर पहुंचाना है और इसके लिए कितनी ट्रेनों की आवश्यकता पड़ेगी। राज्यों ने एक चार्ट तैयार किया है, क्योंकि वे ऐसा करने के लिए सबसे अच्छी स्थिति में थे। 

देश की शीर्ष अदालत ने राज्यों द्वारा तैयार चार्ट को देखने के बाद कहा कि इसके अनुसार महाराष्ट्र की तरफ से केवल एक चार्ट की मांग की गई है। इसके जवाब में मेहता ने कहा कि महाराष्ट्र से हमने पहले ही 802 ट्रेनों को संचालित किया है। फिलहाल एक ट्रेन के लिए अनुरोध किया गया है। 

सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि किसी भी राज्य द्वारा ट्रेनों की मांग किए जाने पर केंद्र सरकार 24 घंटे के भीतर ट्रेनों को वहां भेजेगी। इस पर कोर्ट ने कहा कि हम सभी राज्यों से कहेंगे कि वह अपनी ट्रेनों की मांग को रेलवे को सौंपे। 

बता दें कि शीर्ष अदालत ने 28 मई को निर्देश दिया था कि अपने पैतृक स्थान जाने के इच्छुक सभी प्रवासी कामगारों से ट्रेन या बसों का किराया नहीं लिया जाए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि रास्ते में फंसे श्रमिकों को संबंधित प्राधिकारी नि:शुल्क भोजन और पानी मुहैया कराएंगे।


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दिल्ली सरकार ने कहा-दो लाख मजदूर, वापस नहीं जाना चाहते

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