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लद्दाख तनाव: भारत को तेवर दिखाकर चीन ने अमेरिका को पहुंचाया फायदा?

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Edited By Shatakshi Asthana | नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated:

अमेरिका के बाद ब्रिटेन ने भी Huawei को किया बैन
हाइलाइट्स

  • भारत और चीन के बीच तनाव से अमेरिका को फायदा
  • चीन से तल्खी होने पर भारत जा सकते हैं US के साथ
  • दोनों देशों के बीच सैन्य समझौतों को मिल सकता है बल
  • भारत ने सबसे हमेशा बनाकर रखा है संतुलित व्यवहार

वॉशिंगटन

दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश की गद्दी पर बैठे अमेरिका के लिए भारत का साथ हमेशा से जरूरी रहा है। खासकर, चीन से मिलने वाली चुनौती को देखते हुए अमेरिका के रणनीतिकारों का मानना रहा है कि भारत के साथ उसके सैन्य रिश्ते और मजबूत होने चाहिए। वहीं, भारत हमेशा चीन और अमेरिका के बीच संतुलन कायम रखता आया है। हालांकि, माना जा रहा है कि पिछले महीने लद्दाख में हिंसा के बाद अब शायद भारत को भी यह लगने लगा है कि अमेरिका के साथ संबंध मजबूत नहीं करने से उसे बड़ा नुकसान हो सकता है।

अमेरिका-भारत के रिश्ते मजबूत करने का मौका

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक इंडो-पैसिफिक अफेयर्स के सहायक रक्षा सचिव रह चुके रैंडी श्राइवर का कहना है कि पेंटागन में उनके साथियों का यह मानना था कि लद्दाख में हुई घटना कोई नहीं चाहता था लेकिन यह अमेरिका और भारत के सहयोग को मजबूत करने का अच्छा मौका है। इससे देश की रक्षा रणनीति को बल मिला है। दोनों देशों के बीच अगर रिश्ते गहराते हैं तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक रणनीतिक जीत होगी। ट्रंप ने 2017 में राष्ट्रपति बनने के साथ ही भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिशें शुरू कर दी थीं।

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दोनों देशों के बीच पहले से कई समझौते

2018 में दोनों देशों ने रक्षा समझौते पर दस्तखत किए जिससे भारत को अडवांस्ड अमेरिकी हथियार खरीदने और संवेदनशील सैन्य टेक्नॉलजी शेयर करने का मौका मिला। 2019 में अमेरिका ने दोनों देशों के बीच 4 साल की सबसे बड़ी रक्षा डील अप्रूव की जिससे भारत को एक अरब डॉलर के नौसैनिक हथियार मुहैया कराए गए। पिछले साल दोनों देशों की जल, थल और वायुसेनाओं ने पहली बार संयुक्त युद्धाभ्यास किया। इसी साल फरवरी में दोनों नेताओं ने 3 अरब डॉलर की रक्षा डील की है जिसमें 2.6 अरब डॉलर के Lockheed Martin Corp के बनाए MH-60R Seahawk हेलिकॉप्टर भी शामिल हैं।

पाकिस्‍तान को 7 अरब डॉलर के हथियार दे रहा चीन

  • पाकिस्‍तान को 7 अरब डॉलर के हथियार दे रहा चीन

    भारत के धुर विरोधी पाकिस्‍तान की नौसेना को आधुनिक बनाने के लिए चीन ने अपने हथियारों का जखीरा खोल दिया है। पाकिस्‍तान ने चीन से युआन क्‍लास की 7 डीजल-इलेक्ट्रिक से चलने वाली सबमरीन के लिए करार किया है। ये सबमरीन एयर इंडिपेंडेंट प्रपॉल्‍शन से लैस हैं और लंबे समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। इसके अलावा चीन पाकिस्‍तान को टाइप-054A श्रेणी के बहुउद्देश्‍यीय स्‍टील्‍थ फ्रीगेट्स दे रहा है जो रेडार को चकमा देने में सक्षम हैं। इसके अलावा चीन कई अन्‍य हथियार पाकिस्‍तानी नौसेना को दे रहा है। इसके लिए पाकिस्‍तान ने चीन के साथ 7 अरब डॉलर की डील की थी। पाकिस्‍तान अब अपना 70 फीसदी हथियार चीन से खरीद रहा है।

  • चीनी हथियारों से बेहद घातक हो जाएगी पाक नौसेना

    पाकिस्‍तान की नौसेना के पास इस समय केवल नौ फ्रीगेट्स, पांच सबमरीन और 10 मिसाइल बोट तथा तीन माइनस्‍वीपर हैं। चीन से मिल रहे युद्धपोत से पाकिस्‍तानी नौसेना बेहद घातक हो जाएगी। ये युद्धपोत 4000 समुद्री मील तक हमला कर सकते हैं और इन पर जमीन से हवा और सबमरीन रोधी मिसाइलें लगी हुई हैं। पाकिस्‍तान को ये हथियार 2021-23 के बीच मिल जाएंगे। पाकिस्‍तान को मिलने वाली चीनी युआन क्‍लास की पनडुब्‍बी दुनिया में सबसे शांत मानी जाने वाली पनडुब्‍ब‍ियों में से एक है। इन 8 में से 4 वर्ष 2023 पाकिस्‍तान को मिल जाएंगी।

  • पाकिस्‍तान के ग्‍वादर में विशाल नेवल बेस बना रहा चीन

    चीन अब पाकिस्तान के सहारे हिंद महासागर में पैठ जमाने की कोशिश करता दिख रहा है। पाकिस्तान के ग्वादर में चीन के नेवल बेस के संकेत मिले हैं और माना जा रहा है कि इस बेस के बनने से हिंद महासागर में चीन की मजबूती बढ़ जाएगी। हालिया सैटलाइट तस्वीरों से पता चला है कि पिछले कुछ सालों में यहां कई नए कॉम्प्लेक्स बने हैं। इनमें से एक पोर्ट डिवेलपमेंट करने वाली एक चीनी कंपनी है जहां सिक्यॉरिटी कुछ ज्यादा ही है। पाकिस्तान के पश्चिमी तट पर स्थित ग्वादर चीन की बेल्ट ऐंड रोड योजना का अहम हिस्सा माना जा रहा है। फोर्ब्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां ऐंटी-वीइकल रास्ते, सिक्यॉरिटी फेंसिंग और ऊंची दीवारें खड़ी की गई हैं। पोस्ट और गार्ड टावर फेंसिंग और अंदर की दीवार के बीच बने हुए हैं। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि यहां हथियार बंद गार्ड्स तैनात हैं। इस कंपाउंड के नजदीक इमारतों की दो लाइनें भी हैं। इनकी छतें नीली होने के कारण अंदाजा लगाया जा रहा है कि यह चीन के मरीन कॉर्प्स के बैरक हो सकते हैं।

  • हिंद महासागर में भारत को घेरने में जुटा चीनी ड्रैगन

    लद्दाख में भारतीय जमीन पर कब्‍जा करने की फिराक में लगा चीन अब भारत को उसके घर हिंद महासागर में घेरने की तैयारी में जुट गया है। इसके लिए चीन दोतरफा अभियान चलाए हुए है। एक तरफ चीन जिबूती, ग्‍वादर और मालदीव में नेवल बेस बनाने की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह भारत के शत्रु पाकिस्‍तान को आधुनिक हथियार देकर उसे ताकतवर बना रहा है। नेवल बेस बनाने से चीन को अपने सैन्‍य साजोसामान को तत्‍काल किसी भी जगह भेजने में आसानी होगी। चीन की कोशिश है कि साउथ चाइना सी पर कब्‍जे के बाद दक्षिण एशिया पर अपना दबदबा कायम किया जाए। यही नहीं चीन बांग्‍लादेश और श्रीलंका को भी बड़े पैमाने पर हथियारों की सप्‍लाइ कर रहा है। चीन बांग्‍लादेश और म्‍यामांर में नेवल बेस का विकास कर रहा है।

चीन से पहले से थी अमेरिका की नाराजगी

उधर, हॉन्ग-कॉन्ग में चीन के दखल, शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिमों पर अत्याचार, कोरोना वायरस के चीन से निकलकर दुनियाभर में फैलने और साउथ चाइना सी में चीन की बढ़ती ‘आक्रामकता’ को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव गहरा चुका था और इधर, पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत के साथ चीन की हिंसक झड़प हो गई। एक्सपर्ट्स इसे न सिर्फ भारत के लिहाज से बल्कि अमेरिका के लिए भी अहम मानते हैं कि चीन के खिलाफ दोनों देश आखिरकार एक हो सकते हैं।

अब चीन की नाराजगी का भारत को डर नहीं

आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक भारत और अमेरिका के बीच और ज्यादा सैन्य अभ्यास और हथियारों को लेकर समझौते हो सकते हैं। भारत अब पश्चिमी ताकतों के साथ नजदीकियां बढ़ा रहा है और अब शायद इस बात को लेकर भी ज्यादा चिंता नहीं कर रहा कि ऐसा करने से चीन नाराज हो सकता है। इसकी बानगी इस साल होने वाले मालाबाल नौसैनिक अभ्यास में ऑस्ट्रेलिया को शामिल करने से मिलती है। अभी तक इसमें Quad देशों में से भारत के अलावा सिर्फ जापान और अमेरिका ही आते थे लेकिन पहली बार ऑस्ट्रेलिया को शामिल किया गया है।

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अमेरिका को मिला दक्षिणपूर्व में मौका

वहीं, पेइचिंग भी इस बात को समझ रहा है कि भारत के साथ हुए टकराव से अमेरिका को दक्षिणएशिया की राजनीति में दखल देने का मौका मिल गया है। रेनमिन यूनिवर्सिटी के ओवरसीज सिक्यॉरिटी रिसर्च इंस्टिट्यूट में सीनियर रिसर्चर झू शियान्गमिंग का कहना है, ‘भारत ने हाल में कोशिश की है कि अमेरिका के साथ उसका सैन्य गठबंधन मजबूत हो। चीन के साथ सीमा पर हुई घटना से इसमें तेजी आ सकती है।’

इतने हल्‍के टैंक कि एयरफोर्स ले जाएगी बॉर्डर पर

  • इतने हल्‍के टैंक कि एयरफोर्स ले जाएगी बॉर्डर पर

    सेना ऐसे टैंक खरीदना चाहती हैं जो एयर-ट्रांसपोर्टेबल हों। यानी जरूरत पड़ने पर उन्‍हें फारवर्ड लोकेशंस पर लैंड या एयरड्रॉप किया जा सके। चीन के पास बॉर्डर वाले इलाके में अच्‍छा-खासा रोड नेटवर्क है जबकि भारत अभी इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर मजबूत ही कर रहा है। ऐसे में इन टैंक्‍स के होने से चीनी एग्रेशन का फौरन जवाब देने में मदद मिलेगी। भारत ने सीमा से सटे कई रणनीतिक इलाकों में एयरफील्‍ड तैयार की हैं जहां इन टैंक्‍स को आसानी से पहुंचाया जा सकता है।

  • पूर्वी लद्दाख से सटे एरियाज में तैनात हैं चीन के T-15

    लेफ्टिनेंट जनरल एबी शिवाने (रिटायर्ड) ने अपनी स्‍टडी में कहा है कि चीन ने पूर्वी लद्दाख से सटे इलाकों में T-15/ZTPQ लाइट टैंक्‍स को छिपाकर रखा है। सैटेलाइट इमेजरी से इसका पता चला। उन्‍होंने सुझाव दिया है कि उत्‍तरी फ्रंट जहां मीडियम कैटेगरी के टैंक्‍स नहीं पहुंचते, वहां तेजी से युद्ध क्षमता बढ़ाई जाए। उन्‍होंने इन टैंक्‍स को भारत में बनाने का सुझाव भी दिया है।

  • कौन से टैंक खरीद सकता है भारत?

    भारत में टैंक बनाना तो भविष्‍य की बात है। इमर्जेंसी के लिए भारत के विकल्‍प सीमित हैं क्‍योंकि बहुत कम देश ऐसे टैंक्‍स बनाते हैं। चीन से तो हम खरीद नहीं सकते, अमेरिका का लाइटवेट टैंक प्रोटोटाइप स्‍टेज में हैं। रूस के पास एयर-ट्रांसपोर्टेबल Sprut SDM1 लाइट टैंक जो बहुत कुछ T72 और T90 से मिलता-जुलता है। T72 और T90 भारत के पास पहले से ही हैं।

  • मैदानी इलाकों के मुफीद हैं अभी के टैंक

    भारत की टैंक क्षमता कई देशों के मुकाबले बेहतर हैं लेकिन वे मुख्‍य रूप से मैदानी इलाकों के लिए है। भारत के पास T72, T90 और अर्जुन टैंक हैं। इन टैंक्‍स को हिमालय से लगी सीमा पर तैनात किया गया है मगर पहाड़ों के बीच उन्‍हें चलाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

  • पहले भी छोटे टैंक यूज कर चुका है भारत

    भारत ने 1947-48 में कश्‍मीर ऑपरेशंस और 1962 में चीन से युद्ध के दौरान लाइट टैंक्‍स का इस्‍तेमाल किया था। वे उस वक्‍त बहुत काम आए थे मगर धीर-धीरे चलन से बाहर हो गए क्‍योंकि दुनिया भारी हथियारों की तरफ बढ़ रही थी।

दरअसल, राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से लेकर हवाई तक के क्षेत्र को ‘इंडो-पैसिफिक’ के तौर पर देखना चाहा है और ‘फ्री ऐंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ के प्रति अपनी कटिबद्धिता जताई है। यहां तक कि एक साल बाद ही US पैसिफिक कमांड का नाम भी बदलकर ‘US इंडो-पैसिफिक कमांड’ रख दिया गया। अमेरिका का दावा है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी क्षेत्र में सैन्य आधुनिकीकरण, ऑपरेशन्स और दूसरे देशों पर दबाव डालने के लिए आर्थिक रणनीति का इस्तेमाल कर रही है, US इंडो-पैसिफिक कमांड इसके खिलाफ तैयार है। श्राइवर का दावा है कि दोनों देशों के बीच चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) से संबंधित सेना की खुफिया जानकारियां भी साझा की जाएंगी और हो सकता है कि नौसेना के बाद थलसेनाएं भी साथ में काम करें।

बीच में रूस जैसे कई पहाड़

इस सब के बावजूद कई ऐसे कारण भी हैं जिन्होंने अभी तक अमेरिका और भारत के बीच सैन्य सहयोग का रास्ता रोक रखा है। भारत के रूस के साथ काफी अच्छे संबंध हैं। भारत रशियन S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने जा रहा है। स्टॉकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के मुताबिक रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा आर्म्स सप्लायर है जहां से 2015-19 के बीच 56% सप्लाई आई हैं।

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भारत नहीं चुनेगा एक पक्ष?

वहीं, भारत को लेकर एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि नई दिल्ली पूरी तरह से किसी एक पक्ष की ओर नहीं जाएगा। मुंबई के ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के रिसर्च फेलो कशिश परपियानी का कहना है कि भारत कई देशों से संबंध बनाएगा। इससे सबसे ज्यादा अमेरिका को होगा और साथ ही फ्रांस, इजरायल, रूस और जापान को भी फायदा होगा। जहां तक रही भारत की बात तो जब तक चीन की सेना भारत की ओर मार्च शुरू नहीं कर देती, भारत कोई पक्ष नहीं चुनेगा।

अमेरिका ने दक्षिण चीन सागर में चीन के दावों को खारिज कियाअमेरिका ने दक्षिण चीन सागर में चीन के दावों को खारिज कियाअमेरिका ने दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावे को खारिज करते हुए कहा है कि विश्व समुदाय उसे इस सागर को समुद्री साम्राज्य की तरह इस्तेमाल नहीं करने देगा। अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा कि हम स्पष्ट कर रहे हैं कि अमेरिका दक्षिण चीन सागर के अधिकतर इलाकों पर चीन के दावे को अवैध मानता है।

फाइल फोटो

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