Home मुख्य समाचार ‘एनकाउंटर’ के बाद कैसा है विकास दुबे के बिकरू गांव का हाल

‘एनकाउंटर’ के बाद कैसा है विकास दुबे के बिकरू गांव का हाल

[


इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

शुक्रवार को कानपुर में कथित मुठभेड़ में मारे गए विकास दुबे की एक ओर हैलट अस्पताल में पोस्टमॉर्टम की कार्रवाई और फिर भैरवघाट में अंतिम संस्कार की तैयारियां की जा रही थीं तो दूसरी ओर वहां से क़रीब 40 किलोमीटर दूर बिकरू गांव में पिछले एक हफ़्ते से पसरा सन्नाटा और गहरा गया था.

बिकरू गांव के ज़्यादातर घरों से लोग कथित तौर पर पुलिस के डर से तीन जुलाई के बाद से ही पलायन कर चुके हैं जबकि कुछ घरों में महिलाएं और बच्चे हैं लेकिन पुरुष सदस्य नहीं हैं.

रात में क़रीब आठ बजे बिकरू गांव के भीतर पहुंचने पर अँधेरी सड़कों पर पसरे सन्नाटे को पुलिस और पीएसी के जवानों की बातचीत और चहलक़दमी ही तोड़ती है.

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

कुछ लोग घरों के बाहर चारपाई डाले मिल जाते हैं और कुछ मच्छरदानियों के भीतर सोने की तैयारी में हैं. ये अलग बात है कि हल्की सी आहट भी उन्हें चौंकन्ना कर देती है.

दो जुलाई की रात से ही कटी बिजली अब जोड़ दी गई है क्योंकि रोड लाइटें जल रही हैं और लोगों के घरों के भीतर बल्ब और ट्यूबलाइट भी जल रही हैं.

गांव के लोग विकास दुबे की मौत पर क्या कहते हैं?

विकास दुबे के घर से क़रीब 200 मीटर पहले कुछ ऊंचाई पर बना एक पक्का और छोटा मकान है. घर के बाहर मिथिलेश कुमारी सोनकर अपने कुछ बच्चों के साथ वहां बैठी मिलीं. हमें नज़दीक आते देख अंदर चली गईं लेकिन बुलाने पर बाहर आ गईं और बात करने को तैयार हो गईं.

ये भी पढ़ें: विकास दुबे: ‘मुठभेड़’ की पुलिस की कहानी में इतने इत्तेफ़ाक़ कैसे?

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

Image caption

मिथिलेश कुमारी सोनकर

विकास दुबे के मारे जाने की ख़बर उन्हें भी सुबह मिली थी. कहने लगीं, “हम लोगों के लिए तो बहुत अच्छे थे. हमें जो भी ज़रूरत होती थी, वो पूरी करते थे. सरकारी योजनाएं हों, राशन हो या फिर कोई समस्या हो, वो हमेशा मदद के लिए आगे रहते थे. गांव वालों को तो उनसे कोई शिकायत नहीं थी. बाहर क्या हो रहा था, यह सब हम लोगों को नहीं मालूम.”

मिथिलेश कुमारी के साथ उनके तीन बच्चे भी थे जो पांच-छह साल से लेकर बारह-तेरह साल तक के थे. उनके घर के भी पुरुष सदस्य बाहर चले गए हैं. कहां गए हैं, उनके मुताबिक यह उन्हें भी नहीं मालूम है.

वो कहती हैं, “पुलिस वालों के डर के मारे सब चले गए हैं. कुछ घरों में तो औरतें-बच्चे भी बाहर चले गए हैं लेकिन हम लोग कहीं जा नहीं सकते थे इसलिए यहीं हैं. हमको किसी पुलिस वाले ने परेशान तो नहीं किया लेकिन और घरों में जिस तरह से तोड़-फोड़ की गई है उसे देखकर आदमी लोग डर के भाग गए हैं.”

मिथिलेश के घर से कुछ दूरी पर एक बुज़ुर्ग व्यक्ति मुल्ला लोध सोने की तैयारी कर रहे थे.

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

Image caption

मुल्ला लोध

चारपाई पर मच्छरदानी टँग चुकी थी और बस उसके भीतर जाने ही वाले थे. हमें देखकर थोड़ा बाहर आए जहां रोशनी थी. मुल्ला लोध का मकान तो कच्चा ही था लेकिन खेती अच्छी करते हैं, ट्रैक्टर भी रखे हुए हैं और खेती से संबंधित दूसरे यंत्र भी हैं उनके पास.

‘जल में रहकर मगर से बैर’

विकास दुबे के बारे में पहले तो कुछ बोलने में संकोच करते हैं लेकिन फिर ख़ुद ही बताने लगते हैं, “लल्ला, ये बड़े लोग हैं, हम उनके बारे में क्या कहें. हमें तो उनकी मदद की कभी कोई ज़रूरत नहीं पड़ी और न ही उन्होंने कोई मदद कभी की. बाक़ी प्रधान हैं तो लोग समस्या लेकर उनके पास जाते ही हैं और बड़े लोगों की आदमी तारीफ़ ही करता है. उनकी जगह कोई दूसरा होता तो उसकी भी तारीफ़ लोग करते.”

मुल्ला लोध जब ये बातें कर रहे थे तो बीच-बीच में हँस भी रहे थे. उन्हें हँसी इस बात पर आ रही थी कि ‘विकास दुबे जैसे लोगों की बुराई करने का मतलब, जल में रहकर मगर से बैर करने जैसा है.’

उनका कहना था कि शायद यही वजह है कि गांव में कोई उनकी बुराई नहीं करता.

हालांकि मिथिलेश कुमारी जैसी सोच वाले भी बहुत से लोग हैं, ऐसा ख़ुद मुल्ला लोध भी स्वीकार करते हैं.

ये भी पढ़ें: कानपुर ‘मुठभेड़’ या हैदराबाद ‘एनकाउंटर’: सड़क पर इंसाफ़, जश्न और वही सवाल

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

अब कैसा है विकास दुबे का घर

बिकरू गांव में अंदर आने वाली मुख्य सड़क के टी-प्वाइंट पर विकास दुबे के ढहे हुए मकान के खंडहर दिखते हैं.

मकान थोड़ी ऊंचाई पर बना था. नीम के तीन विशालकाय पेड़ों के अलावा वहां सिर्फ़ ईंट, प्लास्टर, लोहे और लकड़ी का मलबा ही बचा है जो कि एक आलीशान मकान के अस्तित्व को बयां कर रहा है. भीतर ज़मींदोज़ की हुई महंगी गाड़ियां, ट्रैक्टर और कुछ अन्य कृषि उपकरण भी पड़े हैं जो अपनी अवस्था और अँधेरे की वजह से पहचान में नहीं आ रहे हैं.

विकास दुबे के घर के दाहिनी ओर के ठीक सामने प्रेम प्रकाश पांडेय का घर है जिन्हें दो जुलाई की घटना के अगले ही दिन कथित एनकाउंटर में मार गिराया गया था. प्रेम प्रकाश पांडेय के बेटे शशिकांत पांडेय उसी दिन से फ़रार हैं.

दूसरी ओर के मकानों के भीतर बिजली जल रही है और पंखे भी चल रहे हैं लेकिन घर के भीतर कोई नहीं है. बिकरू गांव में ऐसे तमाम मकान हैं. कई घरों के बाहर पशु भी बँधे हैं जिन्हें गांव में बची महिलाएं ही चारा-पानी दे देती हैं.

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

प्रेम प्रकाश पांडेय के घर के बगल वाले घर में भी कोई नहीं है. घर के भीतर रसोई में रखे सामानों से पता चलता है कि इसे छोड़ने वाले ने छोड़ने से पहले इसे करीने से सजाया था लेकिन तलाशी के दौरान सब कुछ बिखेर दिया गया. रसोई के बाहर एक फ़्रिज रखा हुआ है जिसका दरवाज़ा खुला पड़ा है और फ़्रिज के भीतर कुछ नहीं है. जबकि बगल में बेडरूम है जिसे बुरी तरह से अस्त-व्यस्त किया गया है.

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

दो जुलाई की रात का ख़ौफ़ अभी तक

प्रेम प्रकाश पांडेय की पत्नी सुषमा देवी और उनकी बहू मनु पांडेय कमरे में गुमसुम बैठी हैं. मनु पांडेय के दो छोटे बच्चे सो रहे हैं. मनु पांडेय हमसे बात करने के लिए बाहर निकल कर आती हैं और बेहद धीमी आवाज़ में बात करती हैं.

उनके घर के अहाते में ही सीओ बिल्हौर की हत्या हुई थी. उस समय गोलियों की आवाज़ से दोनों महिलाओं ने बच्चों के साथ ख़ुद को कमरे के भीतर ही बंद कर लिया था.

मनु पांडेय कहती हैं, “ये हमारा घर नहीं है. हमें विकास पांडेय ने ही रहने के लिए दिया था. पहले हम लोग बाहर रह रहे थे जहां मेरे पति काम करते थे. लॉकडाउन के चलते यहां आना पड़ा और अब हम लोग फिर जाने की तैयारी कर रहे थे. पुलिस वाले मेरे ससुर को यहां से ले गए और बाद में पता चला कि उनका एनकाउंटर हो गया. मेरे पति भी इसी डर के मारे भाग गए हैं. अब तक कुछ पता नहीं है कि कहां हैं और किस हाल में हैं. दोनों छोटे बच्चे हर समय यही पूछ रहे हैं कि पापा कहां हैं. मेरे ससुर विकास दुबे के रिश्तेदार नहीं बल्कि उनके यहां नौकर थे. ज़बर्दस्ती उन्हें रिश्तेदार बताया जा रहा है.”

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

मनु पांडेय से बातों के दौरान यह साफ़ पता चलता है कि दो जुलाई की रात की घटना का ख़ौफ़ उनके मस्तिष्क में अब तक बना हुआ है. कहती हैं कि ज़रा सी आहट से भी हम लोग डर जाते हैं क्योंकि ज़िंदगी में ऐसी घटना कभी देखी नहीं थी.

घटना के बाद पुलिस ने विकास दुबे के 18 सहयोगियों की एक सूची जारी की थी जिसमें शशिकांत पांडेय का भी नाम है. जबकि इसी सूची में शामिल पांच लोग पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं.

उन्हीं में से एक प्रभात मिश्र के परिजनों का कहना है कि उनके बेटे को पुलिस घर से उठाकर ले गई और बाद में मार दिया गया जबकि पुलिस और एसटीएफ़ ने प्रभात मिश्र को फ़रीदाबाद से गिरफ़्तार करने और फिर ‘भागने की कोशिश और पुलिस पर गोली चलाने के बाद आत्मरक्षा में गोली चलने से हुई मौत’ का दावा किया था.

‘पुलिस पूरे गांव के लोगों को ही मार दे’

प्रभात मिश्र की दादी रामकली इस पूरे प्रकरण से बेहद ग़ुस्से में हैं.

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

Image caption

प्रभात मिश्र की दादी

वो कहती हैं, “पुलिस बहुत ग़लत कर रही है. जब विकास ने समर्पण कर दिया था तो उसे क्यों मार डाला. अब पुलिस पूरे गांव के लोगों को ही मार दे तो अच्छा है. पूरा गांव ही विकास दुबे को जानता था. विकास दुबे के एनकाउंटर पर हम क्या बोलें, पुलिस वालों से ही पूछो.”

बिकरू गांव में दो जुलाई की रात को हुई मुठभेड़ में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या हो गई थी जबकि सात पुलिसकर्मी घायल हैं. इस हत्या के बाद विकास दुबे का साथ देने या फिर हत्याकांड में शामिल होने के शक़ में अब तक विकास दुबे समेत बिकरू गांव के छह लोगों का कथित तौर पर एनकाउंटर हो चुका है.

गांव के लोग इन सभी एनकाउंटर्स पर सवाल उठा रहे हैं. लेकिन अपनी पहचान के साथ सवाल उठाने वाले कम हैं क्योंकि लोगों में उस घटना और फिर उसके बाद हुई कार्रवाई का ख़ौफ़ है.

विकास दुबे की मौत पर जश्न भी

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

विकास दुबे की कथित एनकाउंटर में हुई मौत के बाद बिकरू गांव में कुछ लोगों को जश्न मनाते हुए भी देखा गया.

जश्न मनाने वाले लोग बिकरू गांव के अलावा पड़ोसी गांव शिवली से लेकर कानपुर शहर तक देखे गए.

शुक्रवार को दिन में विकास दुबे के घर के आस-पास तो सन्नाटा रहा, लेकिन गांव के दूसरे हिस्से में लोगों ने एक-दूसरे से गले मिलकर और मिठाइयां बांटकर ख़ुशी का इजहार किया.

मुठभेड़ पर सवाल भले ही उठ रहे हों और विकास की मदद करने में भले ही पूरे चौबेपुर थाने की पुलिस संदेह के घेरे में आई हो लेकिन कानपुर के कई थानों में विकास दुबे की मौत पर पुलिस वालों को बधाइयां दी गईं और माला पहनाकर उनका सम्मान किया गया.

क़रीब ढाई हज़ार की आबादी वाले बिकरू गांव में चार मजरे हैं और सभी मजरे में हर गली में पक्की सड़क और नालियां हैं. जगह-जगह स्ट्रीट लाइटें भी लगी हैं. गांव के लोगों का कहना है कि यहां प्रधान चाहे जो बने, लेकिन विकास के काम विकास दुबे के मशविरे से ही तय होते थे. साल 2011 में इस गांव को निर्मल ग्राम पुरस्कार भी मिल चुका है.

ये भी पढ़ें: उत्तर प्रदेश पुलिस की ‘ठोक देंगे’ परंपरा में क़ानून की जगह कहाँ है? 

इमेज कॉपीरइट
Samiratmaj Mishra

पुलिस गांववालों को सुरक्षा का दे रही भरोसा

गांव में सबसे ज़्यादा आबादी अनुसूचित जाति के लोगों की है. उसके बाद ब्राह्मण और फिर मुस्लिम समुदाय के लोग हैं. शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने भी विकास दुबे की मौत का जश्न मनाया.

गांव के ही रहने वाले रियाज़ अहमद बताते हैं, “पच्चीस-तीस साल पुरानी बात है. कुछ लोगों से विकास दुबे की लड़ाई हुई थी, उसके बाद से मुसलमानों को अक़्सर परेशान करते थे. जैसे सब लोगों में उनका आतंक था, वैसे ही मुसलमानों में भी आतंक था. जिन लोगों ने ख़ुशी मनाई होगी और मिठाई बांटी होगी, उसके पीछे शायद यही वजह हो.”

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

विकास दुबे: ‘एनकाउंटर’ में आख़िर इतने संयोग कैसे?

बहरहाल, विकास दुबे की मौत के बाद पुलिस गांव वालों को वापस आने और अपने घरों में रहने का भरोसा दे रही है लेकिन पलायन कर गए लोग अभी भी आने को तैयार नहीं हैं.

शायद इसकी एक वजह यह भी है कि पुलिस एक ओर उनकी सुरक्षा और गांव में शांति का भरोसा दे रही है तो दूसरी ओर गांव में यह भी अनाउंस किया जा रहा है कि ‘घटना के दिन पुलिस वालों के जो हथियार ग़ायब हुए हैं, यदि गांव वालों को मिलें तो चौबीस घंटे के भीतर सूचित किया जाए.’

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

लोकप्रिय

इनकम बिना एक महीने से ज्यादा सर्वाइव नहीं कर सकते आधे भारतीय: सर्वे

[Edited By Dil Prakash | आईएएनएस | Updated: 10 Jun 2020, 10:10:00 PM IST फाइल फोटोहाइलाइट्स28.2 फीसदी पुरुषों ने माना कि...

टॉप 5 कोरोना वैक्सीन: रेस में सबसे आगे ये टीके, क्या हो सकती है कीमत

[नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated: 28 Jul 2020, 08:41:49 AM IST दुनियाभर में करीब 150 वैक्सीन पर काम चल रहा है। इसमें से 140 से...

वैक्सीन नहीं बनी तो भारत में 2021 में रोजोना आएंगे कोरोना के 2.87 लाख केस, MIT के रिसर्च में दावा

;t=b.createElement(e);t.async=!0;t.src=v;s=b.getElementsByTagName(e);s.parentNode.insertBefore(t,s)}(window,document,'script','https://connect.facebook.net/en_US/fbevents.js');fbq('init', '2442192816092061');fbq('track', 'PageView'); Source link

…तो क्या Delhi-NCR में पुलिस को गुमराह कर रहा था गैंगस्टर विकास दुबे!

https://www.youtube.com/watch?v=JXBGkwG9dMEचप्पे-चप्पे पर फैल गई थी दिल्ली पुलिस ...