Home न्यूज़ भारत 25 जून 1975 – आपातकाल की इनसाइड स्टोरी

25 जून 1975 – आपातकाल की इनसाइड स्टोरी

वैसे तो आपातकाल 1975 में लगाया लगाया गया था। लेकिन इसकी पटकथा की शुरुआत 1971 में ही हो गई थी। 1971 सिर्फ पांचवें लोकसभा चुनाव के लिए ही नहीं बल्कि भारत-पाकिस्तान युद्ध के लिए भी जाना जाता है। यह साल इंदिरा गांधी के लिए बेहद अहम था। इस वक्त तक कांग्रेस के दो फाड़ हो चुके थे। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सारे पुराने दोस्त उनकी बेटी इंदिरा के खिलाफ थे। इंदिरा गांधी अपने एक नारे ‘गरीबी हटाओ’ की बदौलत फिर से सत्ता में आ गईं। उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस ने लोकसभा की 545 सीटों में से 352 सीटें जीतीं। इस तरह 18 मार्च 1971 के दिन इंदिरा गांधी को तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। दिसंबर 1971 में निर्णायक युद्ध के बाद भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान को ‘मुक्ति’ दिला दी। लेकिन  इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। लालबहादुर शास्त्री की मौत के बाद देश की प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी का कुछ कारणों से न्यायपालिका से टकराव पुराना था। 

वर्ष 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी रायबरेली से सांसद चुनी गईं. श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की. राजनारायण ने अपनी याचिका में श्रीमती इंदिरा गांधी पर कुल 6 आरोप लगाए. याचिका के मुताबिक- 

  • पहला आरोप – इंदिरा गांधी ने चुनाव में भारत सरकार के अधिकारी और अपने निजी सचिव यशपाल कपूर को अपना इलेक्शन एजेंट बनाया और यशपाल कपूर का इस्तीफा राष्ट्रपति ने मंजूर नहीं किया.
  • दूसरा आरोप – कि रायबरेली से चुनाव लड़ने के लिए इंदिरा गांधी ने ही स्वामी अद्वैतानंद को बतौर रिश्वत 50,000 रुपए दिए, ताकि राजनारायण के वोट कट सकें.
  • तीसरा आरोप – इंदिरा गांधी ने चुनाव प्रचार के लिए वायुसेना के विमानों का दुरुपयोग किया.
  • चौथा आरोप – इलाहाबाद के डीएम और एसपी की मदद चुनाव जीतने के लिए ली गई.
  • पांचवां आरोप – मतदाताओं को लुभाने के लिए इंदिरा गांधी की ओर से मतदाताओं को शराब और कंबल बांटे गए.
  • छठा आरोप – इंदिरा गांधी ने चुनाव में निर्धारित सीमा से ज्यादा खर्च किया.

12 जून 1975 को राजनारायण की इस याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाया. श्रीमती इंदिरा गांधी को चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का दोषी पाया गया. उनपर अन्य आरोप खारिज कर दिए गए. जस्टिस सिन्हा ने श्रीमती इंदिरा गांधी के निर्वाचन को रद्द कर दिया और 6 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी. इस मामले में राजनारायण के वकील थे शांति भूषण. शांति भूषण बाद में देश के कानून मंत्री भी बने.

हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब श्रीमती इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ता. हाईकोर्ट के फैसले के बाद प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास 1 सफदरजंग रोड पर आपात बैठक बुलाई गई. श्रीमती इंदिरा गांधी ने सभी नेताओं से सलाह मांगी. ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’ का नारा देने वाले कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष डीके बरुआ ने इंदिरा गांधी को सुझाव दिया कि अंतिम फैसला आने तक वो कांग्रेस अध्यक्ष बन जाएं. बरुआ का कहना था कि प्रधानमंत्री वो बन जाएंगे.

लेकिन तभी अचानक बैठक के बीच में ही संजय गांधी की एंट्री हुई. संजय गांधी ने अपनी मां इंदिरा से अकेले में बात की. उन्होंने कहा- इतने सालों की मेहनत के बाद किसी और पर भरोसा नहीं किया जा सकता. संजय गांधी की सलाह के बाद ही श्रीमती इंदिरा गांधी ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ 23 जून को सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट के अवकाश पीठ जज जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने अगले दिन 24 जून 1975 को याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि वो इस फैसले पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की अनुमति दे दी, लेकिन कहा कि वो अंतिम फैसला आने तक सांसद के रूप में मतदान नहीं कर सकतीं. विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला आने तक नैतिक तौर पर इंदिरा गांधी के इस्तीफे पर अड़ गए.

एक तरफ श्रीमती इंदिरा गांधी कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रहीं थीं, दूसरी तरफ विपक्ष उन्हें घेरने में जुटा हुआ था. गुजरात और बिहार में छात्रों के आंदोलन के बाद देश का विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो चुका था. लोकनायक कहे जाने वाले जयप्रकाश नारायण (जेपी) विपक्ष की अगुआई कर रहे थे. वो लगातार कांग्रेस सरकार पर हमला कर रहे थे. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अगले दिन, 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी ने एक रैली का आयोजन किया. अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, आचार्य जेबी कृपलानी, मोरारजी देसाई और चंद्रशेखर जैसे तमाम दिग्गज नेता एक साथ एक मंच पर मौजूद थे. जयप्रकाश नारायण ने अपने भाषण की शुरुआत रामधारी सिंह दिन की मशहूर कविता की एक पंक्ति से की- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है. जयप्रकाश नारायण ने रैली को संबोधित करते हुए लोगों से इंदिरा गांधी सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील की. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पहले से ही नाजुक स्थिति में आ चुकीं इंदिरा गांधी की हालत विपक्ष के तेवर को देखकर और खराब हो गई. विपक्ष के साथ लोग भी सड़कों पर आने लगे. जेपी की इस रैली में केसी त्यागी भी लोकदल के सदस्य के रूप में मंच पर मौजूद थे.

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार जय प्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी के संबंध चाचा और भतीजी वाले थे। लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे को जब जेपी ने प्रखरता से उठाना शुरू किया तो इंदिरा गांधी की एक प्रतिक्रिया से वो संबंध बिगड़ गया। 1 अप्रैल 1974 को भुवनेश्वर में इंदिरा ने बयान दिया कि जो बड़े पूंजीपतियों के पैसे पर पलते हैं, उन्हें भ्रष्टाचार पर बात करने का कोई हक़ नहीं है। कहा जाता है कि इस बयान से जेपी बहुत आहत हुए थे। इंदिरा के इस बयान के बाद जेपी ने पंद्रह बीस दिनों तक कोई काम नहीं किया। खेती और अन्य स्रोतों से होने वाली अपनी आमदनी का विवरण जमा किया और प्रेस को दिया और इंदिरा गांधी को भी भेजा।

कोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी की स्थिति नाजुक हो गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही उन्हें पद पर बने रहने की इजाजत दे दी थी, लेकिन समूचा विपक्ष सड़कों पर उतर चुका था। आलोचकों के अनुसार इंदिरा गांधी किसी भी तरह सत्ता में बने रहना चाहती थीं और उन्हें अपनी पार्टी में किसी पर भरोसा नहीं था। इस तनावकारी स्थिति से निपटने के लिए वह संवैधानिक रास्ता तलाश करने लगीं…इसी तलाश में उनके दिमाग में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिदार्थ शंकर रे का नाम आया, जो संविधान के अच्छे जानकार थे और परिस्थितियों को आसानी से समझ सकते थे। इंदिरा गांधी ने अपने विशेष सहायक आरके धवन को, सिदार्थ शंकर रे को तुरंत बुलाने के लिए कहा। 25 जून 1975 की सुबह, सिद्धार्थ शंकर रे दिल्ली के बंग भवन में अपने कमरे में आराम कर रहे थे, उसी समय फ़ोन की घंटी बजी और और आरके धवन ने रे को तुरंत प्रधानमंत्री के निवास स्थान 1, सफदरजंग पहुंचने के लिए कहा।  इंदिरा गांधी ने सिद्धार्थ शंकर रे से देश में आपातकाल लगाने के लिए संवैधानिक स्थिति को समझना चाहा। सिद्धार्थ शंकर रे ने इंदिरा गांधी से कहा: “मुझे संवैधानिक स्थिति समझने का समय दीजिए”… इंदिरा गांधी समय देने के लिए राजी हो गईं और कहा: “जल्द से जल्द वापस आइए”

सिद्धार्थ शंकर रे आपातकाल पर संवैधानिक स्थिति को समझकर दोबारा दोपहर बाद लगभग साढ़े तीन बजे इंदिरा गांधी के निवासस्थान 1, सफदरजंग रोड पहुंचे। यहां उन्होंने इंदिरा गांधी को बताया कि आंतरिक गड़बड़ियों से निपटने के लिए संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल लगाया जा सकता है। अपनी इसी सलाह के चलते सिद्धार्थ शंकर रे आपातकाल के सूत्रधार भी माने जाते रहे। 25 जून 1975 की रात 11 बजकर 45 मिनट पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश पर आपातकाल की घोषणा करने वाले सरकारी पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया और आपातकाल लागू हो गया। रामलीला मैदान में सुबह हुई रैली की खबर देश के लोगों तक न पहुंचे इसलिए, दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित सभी बड़े अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई। अगले दिन सिर्फ हिंदुस्तान टाइम्स और स्टेट्समैन ही छप पाए, क्योंकि उनके प्रिंटिंग प्रेस बहादुर शाह जफर मार्ग पर नहीं थे।

मीसा’ (मेंटेनेन्स ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) लागू कर बिना वारंट गिरफ्तारी की खुली छूट थी। आपातकाल के दौरान मीसा कानून में कई बार संशोधन भी किए गए। तत्कालीनमहाधिवक्ता (अटॉर्नी जनरल) ने तो यह तक कहा था कि ‘आपातकाल के दौरान राज्य किसी को गोली भी मार सकता है जिसका कोई संवैधानिक प्रतिकार नहीं है।’

आपातकाल के पीछे आंतरिक अशांति को वजह बताया गया. इसके तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मोरारजी देसाई समेत सभी विपक्षी नेता गिरफ्तार कर लिए गए. 26 जून 1975 को सुबह 6 बजे कैबिनेट की एक बैठक बुलाई गई. ये बैठक किसी विचार विमर्श के लिए नहीं बल्कि मंत्रियों को ये सूचना देने के लिए बुलाई गई थी कि आपातकाल लगा दिया गया है.

इस बैठक के तुरंत बाद इंदिरा गांधी, ऑल इंडिया रेडियो के ऑफिस रवाना हो गईं, जहां उन्होंने देश को संबोधित किया. इंदिरा गांधी ने देश की जनता को बताया कि सरकार ने जनता के हित में कुछ प्रगतिशील योजनाओं की शुरुआत की थी. लेकिन इसके खिलाफ गहरी साजिश रची गई इसीलिए उन्हें आपातकाल जैसा कठोर कदम उठाना पड़ा.

इसके बाद प्रेस की आजादी छीन ली गई, कई वरिष्ठ पत्रकारों को जेल भेज दिया गया. अखबार तो बाद में फिर छपने लगे, लेकिन उनमें क्या छापा जा रहा है ये पहले सरकार को बताना पड़ता था.

इंडियन एक्सप्रेस, द स्टेट्समैन और मेनस्ट्रीम जैसे कुछ ही मीडिया संस्थान तब अपवादों में से थे जिन्होंने सरकार की नीतियों का विरोध किया। इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने उस वक्त इमरजेंसी का विरोध करने का नयाब तरीका निकाला। 28 जून 1975 को विरोध स्वरूप इंडियन एक्सप्रेस अखबार का संपादकीय खाली छोड़ दिया। सरकार ने अपनी नाराजगी दिखाने के लिए एक्सप्रेस ऑफिस की दो दिन के लिए बिजली काट दी थी। लंदन टाइम्स, डेली टेलीग्राफ, वॉशिंगटन पोस्ट, द लॉस एंजिलिस टाइम्स के रिपोटर्स को देश छोड़ने का आदेश दे दिया गया। वहीं इकोनॉमिस्ट और गार्जियन अखबार के रिपोटर्स ने धमकियां मिलने के बाद देश छोड़ दिया। 

उस दौर में इमरजेंसी का विरोध करने की सजा जेल होती थी और इस दौरान 21 महीने में 11 लाख लोगों को गिरफ्तार कर जेलों में भेजा गया. कहा जाता है कि उस दौर में देश प्रधानमंत्री कार्यालय से नहीं बल्कि प्रधानमंत्री आवास से चलता था, जहां संजय गांधी रहते थे.

इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के इशारे पर देश में हजारों गिरफ्तारियां हुईं। पत्रकारों को परेशान किया गया। फिल्मों पर जी भर कर सेंसर की कैंची चलाई गई। इन सबके बीच संजय गांधी का पांच सूत्रीय कार्यक्रम भी चल रहा था। इस कार्यक्रम में प्रमुख था-वयस्क शिक्षा, दहेज प्रथा का खात्मा , पेड़ लगाना, परिवार नियोजन  और जाति प्रथा उन्मूलन। लेकिन बाकी तो कहने के लिए थे, इस कार्यक्रम में सबसे ज्यादा जोर परिवार नियोजन पर था। परिवार नियोजन के लिए अस्पतालों में जबरदस्ती लोगों को पकड़कर, नसबंदी कर दी जाती थी।

जनवरी 1977 में देश में इमरजेंसी (आपातकाल) लागू हुए डेढ़ वर्ष से अधिक समय हो चुका था। इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी को अचानक ऑल इंडिया रेडियो पर लोकसभा चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। 

16-20 मार्च के बीच देश में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की ऐतिहासिक हार हुई, इंदिरा और संजय गांधी दोनों ही चुनाव हार गए। 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटा दिया गया और 24 मार्च 1977 को मोरारजी देसाई के नेतृत्व में देश में पहली गैरकांग्रेसी सरकार बनी।

आपातकाल क्या है और 1975 में संविधान द्वारा दिए गए इस अधिकार का कैसे दुरुपयोग हुआ?

संविधान के अनुच्छेद 352 में राष्ट्रीय आपातकाल लगाए जाने के 2 तर्क दिए गए हैं:

  • पहला तर्क- अगर युद्ध जैसे हालात बन जाएं, जिसे आप बाहरी आक्रमण कह सकते हैं.
  • दूसरा तर्क- देश की शांति भंग होने की स्थिति.

इन दो तर्कों के आधार पर ही भारत में राष्ट्रीय आपातकाल लगाया जा सकता है. वर्ष 1975 में जब भारत में आपातकाल लगा तब देश की शांति भंग होने का तर्क दिया गया था.

देश के संविधान में तीन तरह के आपातकाल का जिक्र है. पहला है राष्ट्रीय आपातकाल, दूसरा है राष्ट्रपति शासन और तीसरा है आर्थिक आपातकाल. तीनों ही आपातकाल राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना नहीं लगाए जा सकते हैं. राष्ट्रपति भी ये मंजूरी संसद से आए लिखित प्रस्ताव पर ही दे सकते हैं.

आपातकाल लागू होने के बाद संसद के प्रत्येक सदन में इसे रखा जाता है, अगर वहां इसका विरोध नहीं हुआ तो इसे 6 महीने के लिए और बढ़ा दिया जाता है. 1975 में लगा आपातकाल 21 महीने तक चला था. यानी लगभग 4 बार आपातकाल को बढ़ाए जाने की मंजूरी मिलती रही.

अब सवाल ये है कि आपातकाल खत्म कैसे होता है. जिस तरह से आपातकाल की घोषणा राष्ट्रपति करते हैं ठीक उसी तरीके से लिखित रूप से वो उसे खत्म भी कर सकते हैं. आपातकाल को खत्म करने के लिए संसद की मंजूरी की जरूरत नहीं पड़ती है.

हालांकि न्यायपालिका यानी कोर्ट द्वारा आपातकाल की न्यायिक समीक्षा की जा सकती थी. लेकिन आपातकाल लगाने के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारतीय संविधान में 22 जुलाई 1975 को 38वां संशोधन कर ये न्यायिक समीक्षा का अधिकार कोर्ट से छीन लिया. इसके 2 महीने बाद संविधान में 39वां संशोधन किया गया. इसके मुताबिक अब कोर्ट प्रधानमंत्री के पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच नहीं कर सकता था. 

1975 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने 26 जून की सुबह जब आपातकाल की घोषणा की तब उन्होंने ‘आंतरिक अशांति’ को इसका कारण बताया. हालांकि 1977 मोरारजी देसाई की सरकार ने फिर संविधान में संशोधन कर कोर्ट के वो अधिकार वापस दिलाए, जिन्हें श्रीमती इंदिरा गांधी ने छीन लिया था.

इसके बाद आपातकाल के प्रावधान में संशोधन करके ‘आंतरिक अशांति’ के साथ ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द भी जोड़ दिया. ताकि फिर कभी भविष्य में कोई सरकार इसका दुरुपयोग न कर सके. 

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