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पुरानी अदावत-नए समीकरण, पढ़ें मणिपुर के सियासी संकट की इनसाइड स्टोरी

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  • मणिपुर में सियासी संकट जारी
  • पुराने कांग्रेसियों की जंग बनी वजह
  • सियासी संकट की इनसाइड स्टोरी

मणिपुर में सियासी संकट खत्म नहीं हो रहा है. विधायकों के समर्थन वापस लेने के बाद बीजेपी सरकार पर खतरा मंडरा रहा है. नॉर्थ ईस्‍ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) के संयोजक हेमंत बिस्वा सरमा डैमेज कंट्रोल में लगे हैं और बात अब दिल्ली तक पहुंच गई है, लेकिन संग्राम की ये कहानी लंबी है और इसकी असल वजह पूर्व कांग्रेसी हैं, जो सत्ता के लिए कांग्रेस से बगावत कर दूसरे पाले में चले गए.

मणिपुर संकट की असल वजह पुराने और मौजूदा कांग्रेसी नेता हैं. इस स्टोरी को समझने के लिए 2002 और 2017 में जाना पड़ेगा, जब कांग्रेस नेता ओकराम इबोबी मणिपुर के मुख्यमंत्री थे. इबोबी की कैबिनेट में सबसे विश्वस्त मंत्रियों में एन. बीरेन सिंह थे, जो फिलहाल बीजेपी के मुख्यमंत्री हैं. अक्टूबर 2016 में बीरेन सिंह ने कांग्रेस छोड़ दी है और बीजेपी के साथ चले गए. इसके बाद मार्च 2017 में विधानसभा चुनाव में जीत के बाद बीजेपी ने बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री बना दिया.

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी नेता वाई. जॉयकुमार को टिकट नहीं दिया गया, जिसके चलते उन्होंने बीजेपी छोड़ दी. जॉयकुमार ने दो साल पहले ही बीजेपी ज्वाइन की थी. इससे पहले जॉयकुमार मणिपुर में एक बड़ा नाम थे, लेकिन राजनेता के तौर पर नहीं बल्कि एक अधिकारी के तौर पर. इसके अलावा उनकी एक और पहचान ये थी कि वो तत्कालीन मुख्यमंत्री इबोबी के काफी करीबी रहे हैं. आईपीएस ऑफिसर जॉयकुमार 2007 से 2012 के बीच मणिपुर के डीजीपी रहे. पूर्व मुख्यमंत्री इबोबी सिंह के साथ उनकी नजदीकियां भी हर तरफ चर्चा का विषय रहीं. 2017 के चुनाव में टिकट न मिलने पर बीजेपी छोड़ने के बाद वाई. जॉयकुमार ने एनपीपी ज्वाइन कर ली और उरीपोक सीट से विधानसभा चुनाव भी जीत गए.

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 28 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि बीजेपी को 21 सीटें मिलीं. हालांकि, राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला ने बीजेपी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया. बीजेपी ने सरकार के लिए समर्थन जुटा लिया. बीजेपी को एनपीपी के 4, एनपीएफ के 4, एक टीएमसी, एक एलजीपी और एक निर्दलीय विधायक का समर्थन मिल गया. इसके बाद आठ कांग्रेस विधायकों ने बीजेपी ज्वाइन कर ली, इस तरह बीजेपी सरकार के पास 40 विधायकों का समर्थन हो गया. जबकि दूसरी तरफ कांग्रेस के एक विधायक को स्पीकर ने अयोग्य घोषित कर दिया, जिससे विधानसभा की कुल संख्या 60 से घटकर 59 पहुंच गई.

बीजेपी को समर्थन देने के लिए एनपीपी ने बड़ी डील की और चारों विधायक मंत्री बनाए गए. जॉयकुमार को डिप्टी चीफ मिनिस्टर बनाया गया और वित्त समेत अहम मंत्रालय दिए गए. लेकिन इबोबी सिंह के करीबी रहे सीएम बीरेन सिंह और डिप्टी सीएम जॉयकुमार शुरुआत से चीजें ट्रैक पर नहीं रहीं. 2019 में जॉयकुमार से वित्त मंत्रालय ले लिया गया. सीएम ने खुद इस मंत्रालय का चार्ज संभाल लिया, जिसने दोनों नेताओं के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया.

इसी साल अप्रैल में सीएम बीरेन सिंह ने और आगे बढ़ते हुए डिप्टी सीएम जॉयकुमार के पर कतर दिए और उनके सभी पोर्टफोलियो छीन लिए. दरअसल, राष्ट्रीय फूड सुरक्षा कानून के तहत चावल वितरण पर विवाद होने के बाद बीरेन सिंह ने जॉयकुमार के खिलाफ ये एक्शन लिया था. लॉकडाउन के दौरान जॉयकुमार के बेटे युमनाम देवाजीत के खिलाफ एक केस दर्ज किया गया. देवाजीत का एक ऑडियो क्लिप वायरल हो रहा था जिसमें वो पीएम मोदी की अपील पर कैंडल न जलाने की बात कर रहे थे.

जॉयकुमार और बीरेन सिंह के बीच दूरियां काफी बढ़ गईं. यही वजह रही कि जॉयकुमार ने एनपीपी के तीन अन्य विधायकों के साथ मिलकर सरकार से समर्थन वापस ले लिया. लेकिन सिर्फ एनपीपी के विधायक ही बीरेन सिंह से नाराज नहीं थे. तीन बीजेपी विधायक सुभाषचंद्र सिंह, टीटी हाओकिप और सैमुअल जेंदाई भी बीजेपी से बगावत कर गए. मंत्रिपद न मिलने से नाराज इन तीनों विधायकों ने भी स्पीकर को इस्तीफे सौंप दिए और कांग्रेस के साथ चले गए. इनके अलावा एक टीएमसी और एक निर्दलीय विधायक ने भी बीरेन सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया. इस पूरे घटनाक्रम ने विधानसभा के समीकरण बदल दिए हैं, जिसके चलते इबोबी सिंह ने सरकार बनाने का दावा ठोक दिया है.

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