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स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोविड-19 के लिए संशोधित क्लीनिकल प्रबंधन प्रोटोकॉल जारी किया

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हाइलाइट्स

  • स्वास्थ्य मंत्रालय ने शनिवार को कोविड-19 के लिए क्लीनिकल मैनेजमेंट प्रोटोकॉल की समीक्षा की
  • मंत्रालय ने एजिथ्रोमाइसीन के साथ हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल करने की अनुशंसा समाप्त की
  • भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या अब 3 लाख के पार पहुंच गई है

नई दिल्ली

देश में कोविड-19 के मामले शनिवार को 3 लाख से अधिक होने के बाद सरकार ने इस घातक संक्रमण के इलाज के लिए संशोधित प्रोटोकॉल जारी किया है जिसमें आपातकाल में वायरस रोधी दवा रेमडेसिविर, प्रतिरोधक क्षमता के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा टोसीलीजुमैब और प्लाज्मा उपचार की अनुशंसा की गई है।

मंत्रालय ने शनिवार को कोविड-19 के लिए क्लीनिकल मैनेजमेंट प्रोटोकॉल की समीक्षा की है। इसमें कहा कि बीमारी की शुरुआत में सार्थक प्रभाव के लिए मलेरिया रोधक दवा हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन (एचसीक्यू) का इस्तेमाल किया जाना चाहिए और गंभीर मामलों में इससे बचना चाहिए। मंत्रालय ने नये प्रोटोकॉल के तहत गंभीर स्थिति और आईसीयू की जरूरत होने की स्थिति में एजिथ्रोमाइसीन के साथ हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल किए जाने की पहले की अनुशंसा को समाप्त कर दिया है।

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स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, भारत में कोविड-19 के 2 लाख मामले सामने आने के 10 दिनों बाद शनिवार को यह आंकड़ा तीन लाख के पार पहुंच गया। एक दिन में सर्वाधिक 11,458 मामले भी शनिवार को सामने आए। साथ ही कोरोना वायरस से एक दिन में 386 लोगों की मौत के साथ ही मृतकों की संख्या 8884 हो गई है।

भारत में संक्रमितों की संख्या सौ से एक लाख तक पहुंचने में 64 दिन लग गए, फिर अगले एक पखवाड़े में यह संख्या 2 लाख हो गई। इसने कहा कि कई अध्ययनों में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन के क्लीनिकल इस्तेमाल में काफी लाभ बताये गये हैं। संशोधित प्रोटोकॉल में कहा गया है, कई बड़े अवलोकन अध्ययनों में इसका कोई प्रभाव या सार्थक क्लीनिकल परिणाम नहीं दिखा है। इसमें बताया गया है, अन्य वायरसरोधी दवाओं की तरह इसका इस्तेमाल बीमारी की शुरुआत में किया जाना चाहिए ताकि सार्थक परिणाम हासिल किया जा सके और गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए इसका इस्तेमाल करने से बचा जाना चाहिए।

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संशोधित प्रोटोकॉल के अनुसार प्लाज्मा उपचार मध्यम तौर पर बीमार ऐसे रोगियों के लिए किया जाना चाहिए जिनमें स्टेरॉयड के इस्तेमाल के बावजूद सुधार नहीं आ रहा हो। इस उपचार के तहत कोविड-19 से ठीक हुए व्यक्ति के खून से एंटीबॉडी लिया जाता है और कोरोना वायरस के रोगी में चढ़ाया जाता है ताकि संक्रमण से लड़ने के लिए प्रतिरोधी क्षमता विकसित होने में मदद मिल सके।

दिशानिर्देश में बताया गया है कि टोसीलीजुमैब ऐसे रोगियों को देने पर विचार किया जा सकता है जिनमें मध्यम स्तर की बीमारी हो और उनके लिए ऑक्सीजन की जरूरत बढ़ती जा रही हो, साथ ही ऐसे मरीजों को इसे दिया जा सकता है जो वेंटिलेटर पर हैं और स्टेरॉयड के इस्तेमाल के बावजूद उनमें सुधार नहीं हो रहा है।

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संशोधित क्लीनिकल प्रबंधन प्रोटोकॉल में कोविड-19 के लक्षणों में सूंघने एवं स्वाद की क्षमता के समाप्त होने को भी जोड़ा गया है। मंत्रालय ने कहा कि कोरोना वायरस से पीड़ित मरीज विभिन्न कोविड-19 अस्पतालों में बुखार, कफ, थकान, सांस लेने में तकलीफ, बलगम, मांसपेशियों में दर्द, नाक बहना, गले में खराश और दस्त जैसे लक्षण बता रहे हैं। उन्होंने सूंघने या स्वाद की क्षमता समाप्त होने के बारे में भी बताया है, जो सांस लेने में तकलीफ से पहले शुरू होता है।

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मंत्रालय ने कहा कि सीमित साक्ष्यों के आधार पर रेमडेसिविर, टोसीलीजुमैब और प्लाज्मा उपचार का प्रयोग करने के लिए कहा गया है। इसने कहा कि जिस तरह से स्थितियां उभरेंगी और ज्यादा आंकड़े सामने आएंगे, उसी मुताबिक साक्ष्यों को शामिल किया जाएगा और अनुशंसा में संशोधन किया जाएगा। वर्तमान में भारत में रेमडेसिविर नहीं बनती है। बहरहाल, शनिवार की सुबह आठ बजे मंत्रालय की तरफ से जारी आंकड़े के मुताबिक कोरोना वायरस से संक्रमित एक लाख 45 हजार 779 मरीजों का इलाज चल रहा है और एक लाख 54 हजार 329 मरीज ठीक हो चुके हैं। एक मरीज देश से बाहर चला गया है। मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया, इस तरह से अभी तक 49.95 प्रतिशत रोगी ठीक हो चुके हैं। कुल संक्रमित मामलों में विदेशी नागरिक भी शामिल हैं।

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