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500 अरब डॉलर के पार विदेशी मुद्रा भंडार: तीन दशक में शून्य से शिखर तक कैसे पहुंचा भारत

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भारत का फॉरेक्स रिजर्व 500 अरब डॉलर के पार।
हाइलाइट्स

  • भारत ने विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में नई मंजिल तय कर ली है
  • इतिहास में पहली बार देश का फॉरेक्स रिजर्व 500 अरब डॉलर के पार हो गया है
  • 30 साल पहले वर्ष 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार शून्य पर चला गया था और खूब शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी
  • बीते तीन दशक में भारत ने शून्य से शिखर तक का रास्ता तय कर लिया है

नई दिल्ली

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बताया है कि 5 जून को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) 500 अरब अमेरिकी डॉलर के पार हो गया है। इसके साथ ही, भारत अब चीन और जापान के बाद दुनिया का सबसे समृद्ध विदेशी मुद्रा भंडार वाला देश बन गया है। उपलब्धि का इतिहास रचा जाए तो सीना गर्व से चौड़ा होता ही है, लेकिन जब इतिहास शून्य से शिखर तक पहुंचने का हो, तो खुशी का सारा पैमाना ही टूट जाता है। भारत ने विदेशी मुद्रा भंडार को लेकर तीन दशक में शून्य से शिखर का इतिहास ही रचा है।

याद कीजिए वर्ष 1991 का भुगतान संकट

क्यों भूल गए 1991 का भुगतान संकट? हां, वही दौर जब भारत के पास सिर्फ एक से दो सप्ताह तक के आयात की क्षमता बची थी। 1980-90 के दशक में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार खाली होते-होते ऐसी स्थिति में पहुंच गया था कि 1991 में देश को अपना ‘सोने का खजाना’ गिरवी रखना पड़ गया। उस वक्त प्रधानमंत्री थे चंद्रशेखर और वित्त मंत्री थे यशवंत सिन्हा। वही यशवंत सिन्हा जो अटल बिहार वाजपेयी सरकार में भी वित्त मंत्री रहे।

आनंद महिंद्रा ने दिलाई उस दौर की याद

देश के प्रसिद्ध उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि पर खुशी जताते हुए उस दौर को याद किया। महिंद्रा ने कहा, ’30 साल पहले भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग शून्य हो गया था। अब हमारे पास तीसरा सबसे बड़ा वैश्विक भंडार है।’ उन्होंने कहा, ‘इस अनिश्चित समय में यह खबर मनोबल बढ़ाने वाली है। अपने देश की क्षमता को मत भूलें और आर्थिक वृद्धि के रास्ते पर वापस आने के लिए इस संसाधन का बुद्धिमता से उपयोग करें।’

पूर्व RBI गवर्नर ने बताई शर्मिंदगी की वह कहानी

वहीं, पूर्व आरबीआई गवर्नर वाईवी रेड्डी ने अपने संस्मरण ‘अडवाइज ऐंड डिसेंट’ में 1991 की घटना बहुत बारीक विवरण दिया है। भुगतान संकट से उबरने के लिए सरकार ने सोना गिरवी रखने का फैसला लिया था। इसके लिए आरबीआई से 47 टन सोना एयरलिफ्ट कर बैंक ऑफ इंग्लैंड तक सुरक्षित पहुंचाना था। इसके ऐवज में उसे 40.5 करोड़ डॉलर की राशि मिलनी थी।

पढ़ें: पहली बार विदेशी मुद्रा भंडार 500 अरब डॉलर के पार

गिरवी रखने लिए भेजा जा रहा था सोना, तभी…

सोना आरबीआई से जिस वैन में एयरपोर्ट भेजा जाना था, उसका टायर बीच रास्ते में फट गया। सोने से भरा वाहन जैसे ही रास्ते में रुका तो उसकी सुरक्षा में तैनात आधा दर्जन जवानों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। ‘अडवाइज ऐंड डिसेंट’ में रेड्डी ने बताया कि सुरक्षा कर्मियों की हरकत देख वैन के आसपास कई लोग जुटने लगे। अच्छा था कि किसी के पास उस दौरान स्मार्टफोन नहीं था कि कोई फोटो क्लिक कर उसे ट्विटर पर ट्वीट कर पाए। हालांकि, एयरपोर्ट पर किसी के कैमरे ने उस पल को कैद कर लिया था।

उदारीकरण से खुला विदेशी पूंजी का रास्ता

खैर, चंद्रशेखर की सरकार टिकाऊ साबित नहीं हुई और नए प्रधानमंत्री बने नरसिम्हा राव। इस जोरदार झटके ने नए प्रधानमंत्री को अपने वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के साथ मिलकर वह रणनीति बनाने को मजबूर कर दिया जिससे भविष्य में भारत को ऐसी शर्मनाक परिस्थिति से कभी नहीं गुजरना पड़े। उदारीकरण की रूपरेखा तैयार हुई, भारत को विदेशी पूंजी के लिए खोला गया और धीरे-धीरे भारत में विदेशी पूंजी के रूप में विदेशी मुद्रा आने लगी। आज भारत के पास 500 अरब डॉलर यानी आधा ट्रिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है।

मनमोहन के शासन में खूब बढ़ा फॉरेक्स रिजर्व

नीचे का ग्राफ देखकर अंदाजा लगा सकते हैं कि 1994 से ही भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़ने लगा, लेकिन 2005 से इसने तेज गति से वृद्धि हासिल की। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1999 में बनी पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी जिसने देश के इतिहास में पांच साल का शासन पूरा किया। तब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) 2004 में भी सत्ता वापसी को लेकर बिल्कुल आश्वस्त था। चुनावों में ‘शाइनिंग इंडिया’ का नारा बुलंद किया जा रहा था, लेकिन नतीजे आए तो जीत कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की हुई। प्रधानमंत्री वही मनमोहन सिंह बने जिन्होंने 1991 में बतौर वित्त मंत्री विदेशी मुद्रा भंडार को समृद्ध करने का रास्ता खोला था। अब जब वह खुद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो 10 साल के उनके लागातर दो कार्यकाल में फॉरेक्स रिजर्व ने ऐसी रफ्तार पकड़ी कि कुछ मौकों के छोड़कर आज तक फर्राटे भर रही है।

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मोदी युग में फर्राटे भर रहा भंडार

ग्राफ एक और महत्वपूर्ण बात की ओर इशारा कर कर रहा है- यह कि 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में दोबारा पांच साल पूरा करने वाली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी तो देश के विदेशी मुद्रा भंडार में वृद्धि ने और रफ्तार पकड़ ली। सिलसिला आगे बढ़ता गया और बढ़ ही रहा है। अब हमारे पास तीसरा सबसे बड़ा वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार है। भारत पहले ही विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में रूस और दक्षिण कोरिया से आगे निकल गया था। अब हम चीन और जापान के बाद तीसरे स्थान पर पहुंच गए हैं।

आखिर विदेशी मुद्रा का इतना महत्व क्यों?

लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर विदेशी मुद्रा भंडार की इतनी दरकार है ही क्यों? जवाब है कि हमें कच्चा तेल समेत कई वस्तुएं विभिन्न देशों से आयात करनी पड़ती हैं। चूंकि अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए लेनदेन की मुद्रा अमेरिकी डॉलर ही है, इसलिए अगर डॉलर नहीं हो तो जिस देश से जिस कीमत का सामान खरीद रहे हैं, उसकी कीमत किस मुद्रा से चुकाएंगे? और, अगर आपके पास कीमत चुकाने के लिए करेंसी नहीं है तो कोई आपको सामान क्यों देगा? तो एक बात तो सामान्य है कि हमें दूसरे देशों से वस्तुओं के आयात के लिए विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरत पड़ती है। स्पष्ट है कि जितना बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतनी ज्यादा खरीद की क्षमता। कहा जा रहा है कि अब भारत के पास इतना बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार हो चुका है कि इससे करीब ढाई साल तक की जरूरतों के सामान आयात किए जा सकते हैं।

विदेशी मुद्री की कमाई-खर्च और चालू खाता का हिसाब

एक और सवाल काफी महत्वपूर्ण है कि आखिर हमारे पास विदेशी मुद्रा आती कहां से है? जवाब आसान है- हम भी तो बहुत सारी वस्तुएं निर्यात करते हैं। जब हम किसी देश को कुछ बेचते हैं तो बदले में हमें भी तो अमेरिकी डॉलर ही मिलता है। यही वजह है कि हर देश आयात से ज्यादा निर्यात करना चाहता है ताकि उसके पास खर्च से ज्यादा डॉलर की आमदनी हो।

दरअसल, आयात के लिए खर्च और निर्यात से हुई डॉलर की आमदनी के अंतर को चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) या चालू खाता अधिशेष (Current Account Surplus) कहा जाता है। चालू खाता की स्थिति से किसी देश की आर्थिक ताकत का भी अंदाजा लगाया जाता है। अगर चालू खाता घाटा बढ़ जाए तो समझिए कि आमदनी के मुकाबले डॉलर का खर्च बढ़ रहा है।

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